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आज के दोहे :.....

चरणों में माँ बाप के, सदा नवाओ शीश।
इनमें चारों धाम हैं, इनमें बसते ईश।। १

पथ पथरीला सत्य का , झूठी मीठी छाँव।
माँ के आँचल में मिले ,सच्चे सुख की ठाँव।। २

पग-पग पर घायल करें, पुष्प वेश में शूल।
दर्पण पर विश्वास के, जमी छद्म की धूल।।३

समय सदा रहता नहीं, जीवन के अनुकूल।
एक कदम पर फूल तो , दूजे पर हैं शूल।।४

शादी करके सब कहें, शादी है इक भूल।
जीवन में न संग मिले, जीवन के अनुकूल।।५

सदा लगे वो शूल सी, जो लगती थी फूल।
'ढाल न पाये हम उसे,जीवन के अनुकूल'।।६

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on August 5, 2018 at 2:08pm

क्षमा की आवश्यकता नहीं,हो जाता है भाई ।

Comment by Sushil Sarna on August 5, 2018 at 12:14pm

आदरणीय विजय निकोर साहिब , प्रणाम। .. सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभारी है।

Comment by Sushil Sarna on August 5, 2018 at 12:14pm

आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on August 5, 2018 at 12:09pm

आदरणीय तेजवीर सिंह जी सृजन पर आपकी उत्साहवर्धक प्रशंसा का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on August 5, 2018 at 12:09pm

आदरणीय समर कबीर साहिब , आदाब ... सृजन पर आपकी प्रशंसात्मक एवं सुझावात्मक प्रतिक्रिया का दिल से आभार। आपके सुझाव पर मैं अभी अमल करता हूँ सर। इसके लिए आपका दिल से शुक्रिया। कंप्यूटर में तकनीकि व्यवधान के कारण आभार व्यक्त करने में हुए विलम्ब के लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ।

Comment by Sushil Sarna on August 5, 2018 at 12:08pm

आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी सृजन को मान देने का दिल से आभार। कंप्यूटर में तकनीकि व्यवधान के कारण आभार व्यक्त करने में हुए विलम्ब के लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ।

Comment by Sushil Sarna on August 5, 2018 at 12:08pm

आदरणीय नीलम उपाध्याय जी सृजन आपकी मधुर प्रशंसा का दिल से आभारी है । कंप्यूटर में तकनीकि व्यवधान के कारण आभार व्यक्त करने में हुए विलम्ब के लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on July 31, 2018 at 9:36pm

आ0 सुशील शरण साहब पहला दोहा अतुलनीय । बाकी सभी दोहे मनोहारी लगे । हार्दिक बधाई ।

Comment by TEJ VEER SINGH on July 31, 2018 at 8:41pm

हार्दिक बधाई आदरणीय सुशील सरना जी।बेहतरीन दोहे।

Comment by Samar kabeer on July 31, 2018 at 6:59pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत उम्दा दोहे लिखे आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

बन गयी है शूल वो,'---12 मात्रा, यूँ करलें:-

'बनी हुई है शूल वो'

ढाल सके न उसको हम, जीवन का अनुकूल।

इस पंक्ति के विषम चरण में मात्रा 222 हो रही है जबकि 212 होना चाहिए,इसी तरह आगे 'का' की जगह " के" होना चाहिए,यूँ कर लें :-

'ढाल न पाये हम उसे,जीवन के अनुकूल'

कृपया ध्यान दे...

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