For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

धार्मिक पशु (लघुकथा)

उसका सपना था कि दुनिया ख़त्म हो जाए और दुनिया ख़त्म गयी। अब अगर कोई बचा था तो सिर्फ़ वो और उसकी टूटी-फूटी मोहब्बत।

"अब तो इसे मुझसे बात करनी ही पड़ेगी।" खण्डहर बन चुके शहर की वीरान सड़क पर खड़े उस शख़्स ने कहा।

वह उससे बेपनाह मुहब्बत करता था। वह चाहता था कि वो उसे देखे, उसे समझे, उससे बात करे मगर वो हमेशा ही किसी न किसी और को ढूँढ लेती थी। वह इस बात से हमेशा दुःखी रहता था कि उसे छोड़कर वो बाकी सबसे बात करती है मगर उससे नहीं। उसने कहीं पढ़ा था कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है। इसलिए उसने सोचा कि दुनिया अगर ख़त्म हो जाए और फिर सिर्फ़ वो दोनों ही बचें तो उसे हार कर उससे बात करनी ही पड़ेगी। मगर बात तो दूर वह तो उसकी तरफ़ देख भी नहीं रही थी।

वह उसके सामने जा कर खड़ा हो गया पर उसने हमेशा की तरह एक बार फिर मुँह फेर लिया। उससे बर्दाश्त नहीं हुआ। उसने उसका हाथ पकड़ा और कहा, "तुम मुझसे बात क्यों नहीं करती?" उसने गुस्से से उसकी तरफ़ देखा और उसका हाथ झटक कर वहाँ से चली गयी। वह उसे चुपचाप देखता रहा जैसे कि वो हमेशा देखा करता था।

वो एक टूटे हुए खम्भे के पास जा कर रुक गयी और उससे कुछ कहने लगी। फिर एक मकान के अन्दर गयी और उसकी टूटी हुई खिड़कियों और दरवाज़ों से हँस-हँस कर बातें करने लगीं।

वह आश्चर्यचकित था। "मैं इतना गया-गुज़रा हो गया हूँ!" वह बड़बड़ाते हुए उसके पास जा पहुँचा। "तुम निर्जीव चीजों तक से बात कर सकती हो मगर मुझसे नहीं। तुम्हें आज बताना ही होगा। मेरे अन्दर क्या कमी है?"

उसने पहली बार उसकी आँखों में आँखें डाल कर देखा और कहा, "तुम हिन्दू हो।"

"तो?" उसे लगा यह कौन सी बड़ी बात है।

"और मैं मुस्लिम।" पर उसकी आँखों से नफ़रत झलक रही थी। "तुम ये बात आज अच्छे से समझ लो, मैं तुमसे कभी प्यार नहीं कर सकती। अगर ये सारी बेजान चीज़ें भी ख़त्म हो जायें तो भी।"

वह धम्म से ज़मीन पर गिर पड़ा। अब वह क्या करे? वह पूरी तरह से असहाय हो चुका था। उसकी लड़ाई उससे नहीं, उसके ईश्वर से थी।

उसने पास में पड़ी हुई एक रस्सी उठायी और उसके गले को कस दिया। "आज मैं तुझे ज़िन्दा नहीं छोड़ूँगा।"

"ख़ुदा की राह में मरना मेरे लिए फ़क्र की बात होगी।" उसके चेहरे पर डर का कोई भाव नहीं था।

"मैं तेरे ख़ुदा का भी गला घोंट दूँगा और फिर ये किस्सा ही हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएगा।" वह पागल हो चुका था।

उसकी बात सुनकर वह ज़ोर से हँसी और बोली, "तू दोज़ख़ में जाएगा क़ाफ़िर! तेरे लिए कभी न ख़त्म होने वाली आग है।"

उसने फन्दे को कस दिया। वह तड़पने लगी और थोड़ी ही देर में तड़पते-तड़पते मर गयी।

उसकी लड़ाई उससे नहीं, उसके ईश्वर से थी। दुनिया ख़त्म हो चुकी थी मगर चीज़ें अब भी वैसी की वैसी ही थीं। वह बीच सड़क पर नमाज़ पढ़ रही थी और उससे दूर पड़ी थी उस क़ाफ़िर की लाश जिसने अपना गला घोंट कर ख़ुद को मार लिया था।

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 694

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Mahendra Kumar on August 22, 2018 at 1:33pm

आप जैसे प्रबुद्ध पाठकों का मिलना सौभाग्य की बात है। आपका पुनः बहुत-बहुत आभार आदरणीय शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी। हार्दिक धन्यवाद। सादर।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on August 18, 2018 at 10:57am

शुक्रिया मेरी टिप्पणी के अनुमोदन और पुनर्विचार कर बढ़िया तनिक बदलाव के लिए आदरणीय महेंद्र कुमार साहिब।

Comment by Mahendra Kumar on August 16, 2018 at 7:46pm

आदरणीया बबिता जी, मुझे खेद है कि रचना आप तक नहीं पहुँच सकी। लड़का कट्टर नहीं था। रही बात धर्म परिवर्तन की तो उससे मैं इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता क्योंकि प्रेम में धर्म परिवर्तन का अर्थ हुआ कि धर्म प्रेम से बड़ा है। इस पर अलग से कभी कुछ लिखूँगा। रचना पर उपस्थित हो कर मेरा उत्साहवर्धन करने के लिए आपका हृदय से आभारी हूँ। बहुत-बहुत धन्यवाद। सादर।

Comment by Mahendra Kumar on August 16, 2018 at 7:41pm

आदरणीय शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी, आपकी समीक्षात्मक टिप्पणी के लिए हृदय से आभारी हूँ। वांछित सुधार कर दिया है। एक बार देख लीजिएगा। बहुत-बहुत धन्यवाद। सादर।

Comment by Mahendra Kumar on August 16, 2018 at 7:38pm

सादर आदाब आदरणीय समर कबीर सर। लघुकथा को पसन्द करने के लिए आपका हृदय से आभार। बहुत-बहुत धन्यवाद। सादर।

Comment by babitagupta on August 15, 2018 at 4:11pm

दोनों ही कटटर धार्मिक निकले,अगर मोहब्बत को सर्वोपरि माना था तो लड़के को धर्म परिवर्तन करके ज़िंदा रखके मशाल देनी थी समाज को। बेहतरीन रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार कीजियेगा आदरणीय सरजी।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on August 10, 2018 at 9:52pm

 उम्दा कथानक और कथ्य के साथ बढ़िया सृजन। हार्दिक बधाई आदरणीय महेंद्र कुमार साहिब। आप बेहतरीन लघुुकथा कहने जा रहे थे। 

लेकिन पोस्ट करने से पहले पाठकीय अवलोकन में कहीं कुछ कमी रह गई। आशय यह कि रचना तनिक. संपादन/परिमार्जन/स्पष्टता मांग रही है। विशेषकर शीर्षक तथा दूसरे और तीसरे अनुच्छेदों में। कसावट की जा सकती है मेरी पाठकीय नज़र में। पूरी रचना एक सपना है या सपना समाप्त होने के बाद कोई सत्योद्घाटन भी? सादर।

Comment by Samar kabeer on August 10, 2018 at 1:55pm

जनाब महेन्द्र कुमार जी आदाब, अच्छी लघुकथा हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Mahendra Kumar on August 10, 2018 at 9:41am

मुझे नहीं लगता कि रचना कहीं से भी उलझी हुई है। यदि आप बता सकें कि कहाँ पर आपको ऐसा लगा तो शायद मैं उसे स्पष्ट कर सकूँ। अरस्तू ने मनुष्य को सामाजिक प्राणी कहा था। इस रचना में उसका खण्डन करते हुए मैंने उसे धार्मिक पशु कहा है। रचना पर उपस्थित हो कर अपने मत से अवगत कराने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। हार्दिक आभार। सादर।

Comment by pratibha pande on August 10, 2018 at 9:16am

धर्मान्धता  सभ्यता के विनाश का कारक है  शायद ये ही कहना चाह रहे हैं आप इस रचना के माध्यम से। रचना कई जगह उलझ गई है या शायद मै ही नहीं समझ पाई। शीर्षक के लिये विशेष बधाई

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178

आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
9 hours ago
amita tiwari posted a blog post

गर्भनाल कब कट पाती है किसी की

कहीं भी कोई भी माँ अमर तो नहीं होती एक दिन जाना होता ही है सब की माताओ को फिर भी जानते बूझते भी…See More
22 hours ago
vijay nikore commented on Sushil Sarna's blog post दोहा दशम. . . . . उम्र
"भाई सुशील जी, सारे दोहे जीवन के यथार्थ में डूबे हुए हैं.. हार्दिक बधाई।"
yesterday
vijay nikore posted a blog post

प्यार का पतझड़

एक दूसरे में आश्रय खोजतेभावनात्मक अवरोधों के दबाव मेंकभी ऐसा भी तो होता है ...समय समय से रूठ जाता…See More
yesterday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"प्रारम्भ (दोहे) अंत भला तो सब भला, कहते  सब ये बात। क्या आवश्यक है नहीं, इक अच्छी…"
Sunday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"आदरणीय  जयहिंद रायपुरी जी अच्छा हायकू लिखा है आपने. किन्तु हायकू छोटी रचना है तो एक से अधिक…"
Sunday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"हाइकु प्रारंभ है तो अंत भी हुआ होगा मध्य में क्या था मौलिक एवं अप्रकाशित "
Saturday
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"स्वागतम"
Friday
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185

आदरणीय साहित्य प्रेमियो,जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर…See More
Apr 8
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद ' जी सादर अभिवादन प्रथम तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ देरी से आने की…"
Apr 7
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा दशम. . . . . उम्र

दोहा दशम् . . . . उम्रठहरी- ठहरी उम्र अब, करती एक सवाल ।कहाँ गई जब जिंदगी, रहती थी खुशहाल ।।यादों…See More
Apr 6
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय Jaihind Raipuri साहिब, नमस्कार। बढ़िया ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें। /ये मेरा…"
Apr 3

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service