अरकान:-
फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन फ़ा
फिर ज़ख़्मों को धोने का दिल करता है
चुपके चुपके रोने का दिल करता है
जब जब भी मैं तुझको देखूँ ऐ दिलबर
अपना सब कुछ खोने का दिल करता है
होती है जब ग़म की यूरिश इस तन पर
चादर तान के सोने का दिल करता है
काले काले बादल झूम के बरसें तो
तुझको संग भिगोने का दिल करता है
रोते देखूँ जब 'संतोष' किसी को मैं
तब मेरा भी रोने का दिल करता है
~संतोष_खिरवड़कर
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
Comment
जनाब संतोष जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,बधाई स्वीकार करें ।
आलरणीय संतोष खिरवड़कर जी आदाब,
बेहद मुश्क़िल बह्र में बहुत ही लाजवाब ग़ज़ल । शे'र दर शे'र दाद के साथ दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें ।
बहुत शुक्रिया आ. शर्मा साहब!!!
बहुत खूब , सरल सहज सुंदर गजल
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