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बेज़ुबान पहचान ...

बेज़ुबान पहचान ...

कितनी खामोशी होती है
कब्रिस्तान में
जिस्मों की मानिंद
कब्रों पर लिखे नाम भी
वक्त के थपेड़ों से
धीरे -धीरे
सुपुर्द-ए-ख़ाक हो जाते हैं


रह जाती है
कब्रों पर
उगी घास के नीचे
ख़ामोशी की कबा में सोयी
अपने -पराये रिश्तों की
बेज़ुबान पहचान

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 584

Comment

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Comment by Sushil Sarna on October 9, 2018 at 7:58pm

आदरणीय Dr Ashutosh Mishra  जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on October 9, 2018 at 7:57pm

आदरणीय narendrasinh chauhan  जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on October 9, 2018 at 7:57pm

आदरणीय  डॉ छोटेलाल सिंह जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार।

Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 9, 2018 at 5:26pm

बेहतरीन रचना आदरणीय सुशील सरना जी ...गागर में सागर हार्दिक बधाई सादर 

Comment by narendrasinh chauhan on October 6, 2018 at 5:45pm

झुब सुन्दर रचना सर

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on October 6, 2018 at 1:28pm

आदरणीय सुशील सरना जी बहुत सुंदर पंक्तियाँ सृजित करके आपने मन मोह लिया बधाई हो 

Comment by Sushil Sarna on October 4, 2018 at 6:33pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on October 4, 2018 at 6:33pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब , सर सृजन को अपनी स्नेहाशीष से अलंकृत करने का दिल से शुक्रिया।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 4, 2018 at 6:23pm

आ. भाई सुशील जी, बेहतरीन रचना हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on October 4, 2018 at 1:56pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत सच्ची और सुंदर कविता,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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