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अजनबी लगता है ... ...

अजनबी लगता है ... ...

न वज़ह पूछी
न मौका मिला
वक्त सरकता रहा
कोई अपना
हर लम्हा
अजनबी लगता रहा

किसे आवाज़ दूँ
तारीकियों की क़बा में
उजालों को ओढ़ कर
खो गयी कोई तलाश
टूट गया
उसके साये होने का भ्रम
बावज़ूद ज़िस्मानी करीबी के
वो हर नफ़स
जाने क्यूँ
अजनबी लगता रहा

झूठ है
वो अजनबी है
मेरी तिश्नगी का
समंदर है वो
मेरे हर ख्वाब का
मंज़र है वो
मेरे ज़ह्न में सदियों से पोशीदा
नर्म अहसासों की
हकीक़त है वो
मेरा आग़ाज़ है वो
मेरा अंजाम है वो
बिस्तर की हर शिकन
उसके शीरीं से
रुमानियत भरे लफ़्ज़ों से महकती है

न,न
वो अजनबी नहीं हो सकता
मगर हाँ
सच कहूँ तो मुझे
उसमें में छुपा
वो पहला अजनबी
बहुत अज़ीज़ लगता है
वो तो कोई और होगा
जो बेताब नज़रों को
अजनबी लगता है

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित



Views: 586

Comment

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 8, 2018 at 8:33pm

वाह आदरणीय बहुत ही सुन्दर कविता..

Comment by Neelam Upadhyaya on October 8, 2018 at 12:12pm

आदरणीय सुशिल सरना  जी, अच्छी रचना की प्रस्तुति पर  बधाई स्वीकार करें। 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 7, 2018 at 5:25am

आ. भाई सुशील जी, बेहतरीन रचना हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by narendrasinh chauhan on October 6, 2018 at 5:42pm

खुब सुन्दर रचना आदरणिय

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on October 6, 2018 at 1:18pm

आदरणीय सुशील सरना जी बहुत बेहतरीन कविता का सृजन किया उम्दा भाव के साथ आकर्षक पंक्तियाँ लिखने के लिए बहुत बहुत बधाई

Comment by Samar kabeer on October 6, 2018 at 12:31pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत उम्दा कविता हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 5, 2018 at 9:44pm

बेहतरीन सृृृजन। रूमानियत और वह अजनबी! वाह। हार्दिक बधाई आदरणीय सुशील सरना साहिब।

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