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३ क्षणिकाएं....

भावनाओं की घास पर
ओस की बूंदें
रोती रही
शायद
बादलों को ओढ़कर
रात भर
चांदनी
... ... ... ... ... ... .

गोद दिया
सुबह की ओस ने
गुलाब को
महक
तड़पती रही
अहसासों के बियाबाँ में
यादों की नोकों पर
... ... ... .. .. .. .. . .
आकाश
ज़िंदगी भर
इंसान को
छत का सुकून देता रहा
उसे
धूप दी, पानी दिया ,
ईश के होने का
अहसास दिया
मगर
वह रे इंसान
आया जो वक्त देने का
भर दिया उसका दामन
चिता में जल के
धुएँ के गुबार से

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on October 14, 2018 at 11:58am

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार।

Comment by नाथ सोनांचली on October 13, 2018 at 8:42am

आद0 सुशील सरना जी सादर अभिवादन। बढ़िया क्षणिकाएँ रची आपने। बधाई स्वीकार कीजिये

Comment by Sushil Sarna on October 11, 2018 at 2:56pm

आदरणीय  बृजेश कुमार 'ब्रज जी सृजन आपकी आत्मीय प्रशंसा की दिल से आभारी है। 

Comment by Sushil Sarna on October 11, 2018 at 2:55pm

आदरणीय  narendrasinh chauhan जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार। 

Comment by Sushil Sarna on October 11, 2018 at 2:54pm

आदरणीय  Sheikh Shahzad Usmani जी सृजन पर आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभार /

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 11, 2018 at 11:35am

वाह सुन्दर बहुत सुन्दर रचनाये...

Comment by narendrasinh chauhan on October 10, 2018 at 4:20pm

खुब सुन्दर रचनाए

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 9, 2018 at 8:56pm

अलंकृत बिम्बों में बेहतरीन सारगर्भित विचारोत्तेजक सृजन। हार्दिक बधाई आदरणीय सुशील सरना साहिब।

Comment by Sushil Sarna on October 9, 2018 at 7:59pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब। ... सृजन आपकी आत्मीय प्रशंसा एवं सुझाव का दिल से आभार।

Comment by Samar kabeer on October 9, 2018 at 2:42pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत उम्दा क्षणिकाएं हुई हैं,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

'रोती रही'--"रोती रहीं"

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