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पागल मन ..... (400 वीं कृति )

पागल मन ..... (400 वीं कृति )

एक
लम्बे अंतराल के बाद
एक परिचित आभास
अजनबी अहसास
अंतस के पृष्ठों पे
जवाबों में उलझा
प्रश्नों का मेला
एकाकार के बाद भी
क्यूँ रहता है
आखिर
ये
पागल मन
अकेला

तुम भी न छुपा सकी
मैं भी न छुपा सका
हृदय प्रीत के
अनबोले से शब्द
स्मृतियाँ
नैन घनों से
तरल हो
अवसन्न से अधरों पर
क्या रुकी कि
मधुपल का हर पल
जीवित हो उठा
मन हस पड़ा
साथ
आभास हो गया
और आभास
सदा का
साथ हो गया
स्मृतियाँ
अंश हो गई
एकाकी जीवन की
न जाने
किसकी श्वासों से
अपनी श्वासों को
प्राण देने का
प्रयास कर रह है
ये
पागल मन
अकेला


सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by PHOOL SINGH on Tuesday

सूंदर रचना बधाई स्वीकारे

Comment by Sushil Sarna on November 13, 2018 at 6:59pm

आदरणीय राज़ नवादवी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार। गृह निवास से बाहर होने के कारण आभार व्यक्त न कर सका , क्षमा चाहता हूँ।

Comment by राज़ नवादवी on November 4, 2018 at 3:32pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,सुन्दर  कविता के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें । सादर. 

Comment by Sushil Sarna on October 17, 2018 at 7:27pm

आदरणीय  V.M.''vrishty''जी सृजन पर आपकी मधुर प्रशंसा का आभारी है।

Comment by Sushil Sarna on October 17, 2018 at 7:25pm

आदरणीय डॉ छोटेलाल सिंह जी सृजन पर आपकी मनोहारी प्रशंसा का आभारी है।

Comment by Sushil Sarna on October 17, 2018 at 7:25pm

आदरणीय नरेंद्र सिंह चौहान जी सृजन पर आपकी मधुर प्रशंसा का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on October 17, 2018 at 7:24pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on October 17, 2018 at 7:23pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब ... सर प्रस्तुति के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार।

Comment by V.M.''vrishty'' on October 17, 2018 at 1:02pm
आदरणीय सुशील सरना जी,प्रणाम! अनुभूति की गहराई लिए बेहद खूबसूरत रचना। बहुत बहुत बधाई!
Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on October 16, 2018 at 2:37pm

आदरणीय सुशील सरना जी बेहतरीन सुसज्जित रचना के लिए हार्दिक बधाई

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