वो बैठा दिल में आन सलीके से
फिर ले ली मेरी जान सलीके से
यूँ ही पहले थोड़ी सी बात हुई
बन बैठे फिर अरमान सलीके से
पल भर को पहलू में आओ चन्दा
इतना तो कर अहसान सलीके से
काफी है पलकों का उठना गिरना
तू नैन कटारी तान सलीके से
दिल की दुनिया लूट गईं दो आँखें
फिर होती हैं हैरान सलीके से
कोने की उस जर्जर अलमारी में
रख छोड़े कुछ अरमान सलीके से
जिनको थी लाज बचानी कलियों की
बन बैठे वो हैवान सलीके से
नाजों से जिसने पाला 'ब्रज' तुमको
तुम रखना उनका मान सलीके से
क्या खूब ग़ज़ल तुमने कह डाली 'ब्रज'
अब तो वो देगा ध्यान सलीके से
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'
Comment
आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज'जी सादर नमस्कार - अच्छी गजल के लिए बधाई स्वीकार करें
आदरणीय नीलेश जी आदरणीय समर जी..वाकई में मतले और एक दो शे'र छोड़कर बाकी लय तो नहीं है..मैंने भी कई बार पढ़ा। 10 रुक्न की वजह से लय बाधित है क्या?
आदरणीय विजय जी सादर धन्यवाद
लय तो पूरी ग़ज़ल में नहीं है,लय के लिए इसमें मेरे नज़दीक एक "फ़ा" और होना था ।
आ. बृजेश जी,
अच्छी ग़ज़ल हुई है ..लेकिन सच कहूँ तो मुझे कई जगह लय बाधित लगी..
बाकी वरिष्ठजन कहेंगे
सादर
आपकी गज़ल अच्छी लगी। हार्दिक बधाई मित्र बृजेश जी।
आदरणीय समर जी बहुत बहुत शुक्रिया..ये बहुत ही बारीक़ है लेकिन मुझे फिर भी समझना ही होगा।यथोचित सुधार करता हूँ..सादर
हौसलाफजाई के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय तिवारी जी..सादर
// पल भर को पहलू में आओ चन्दा
इतना तो कर अहसान सलीके से//
ऊला में 'आओ' को "आजा" करने से ये ऐब निकल सकता है ।
आदरणीय बृजेश जी, बहुत ख़ूबसूरती से इसे बह्रे-मुतदारिक मख़्बून मुसक्किन 10 रुक़्नी में बाँधा है आपने. ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई.
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