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ग़ज़ल...ले ली मेरी जान सलीके से-बृजेश कुमार 'ब्रज'

वो बैठा दिल में आन सलीके से
फिर ले ली मेरी जान सलीके से

यूँ ही पहले थोड़ी सी बात हुई
बन बैठे फिर अरमान सलीके से

पल भर को पहलू में आओ चन्दा
इतना तो कर अहसान सलीके से

काफी है पलकों का उठना गिरना
तू नैन कटारी तान सलीके से

दिल की दुनिया लूट गईं दो आँखें
फिर होती हैं हैरान सलीके से

कोने की उस जर्जर अलमारी में
रख छोड़े कुछ अरमान सलीके से

जिनको थी लाज बचानी कलियों की
बन बैठे वो हैवान सलीके से

नाजों से जिसने पाला 'ब्रज' तुमको
तुम रखना उनका मान सलीके से

क्या खूब ग़ज़ल तुमने कह डाली 'ब्रज'
अब तो वो देगा ध्यान सलीके से
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 28, 2018 at 9:02pm

आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज'जी सादर नमस्कार - अच्छी गजल के लिए बधाई स्वीकार करें 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 28, 2018 at 9:00pm

आदरणीय नीलेश जी आदरणीय समर जी..वाकई में मतले और एक दो शे'र छोड़कर बाकी लय तो नहीं है..मैंने भी कई बार पढ़ा। 10 रुक्न की वजह से लय बाधित है क्या?

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 28, 2018 at 8:55pm

आदरणीय विजय जी सादर धन्यवाद

Comment by Samar kabeer on October 28, 2018 at 2:53pm

लय तो पूरी ग़ज़ल में नहीं है,लय के लिए इसमें मेरे नज़दीक एक "फ़ा" और होना था ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 28, 2018 at 8:49am

आ. बृजेश जी,
अच्छी ग़ज़ल हुई है ..लेकिन सच कहूँ तो मुझे कई जगह लय बाधित लगी..
बाकी वरिष्ठजन कहेंगे 
सादर 

Comment by vijay nikore on October 28, 2018 at 1:40am

आपकी गज़ल अच्छी लगी। हार्दिक बधाई मित्र बृजेश जी।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 27, 2018 at 7:34pm

आदरणीय समर जी बहुत बहुत शुक्रिया..ये बहुत ही बारीक़ है लेकिन मुझे फिर भी समझना ही होगा।यथोचित सुधार करता हूँ..सादर

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 27, 2018 at 7:32pm

हौसलाफजाई के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय तिवारी जी..सादर

Comment by Samar kabeer on October 27, 2018 at 11:34am

// पल भर को पहलू में आओ चन्दा
इतना तो कर अहसान सलीके से//

ऊला में 'आओ' को "आजा" करने से ये ऐब निकल सकता है ।

Comment by Ajay Tiwari on October 27, 2018 at 7:25am

आदरणीय बृजेश जी, बहुत ख़ूबसूरती से इसे बह्रे-मुतदारिक मख़्बून मुसक्किन 10 रुक़्नी में बाँधा है आपने. ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई.

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