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दर्द का आँखों में सबकी - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर' ( गजल )

२१२२ /२१२२  /२१२२/ २१२

दर्द का आँखों में सबकी इक समंदर कैद है
चार दीवारी में हँसता आज हर घर कैद है।१।


हो न जाये फिर वो हाकिम खूब रखना ध्यान तुम
जिसके  सीने  में  नहीं  दिल  एक  पत्थर  कैद है।२।


जब से यारो ये सियासत हित परस्ती की हुयी
हो गया  आजाद  नेता  और  अफसर कैद है।३।


राज्य कैसा राम का यह ला रहे ये देखिये
बंदिशों से मुक्त रहजन और रहबर कैद है।४।


गाँव से  दूरी  अधिक   है  मानते  कानून की
शहर में भी कौन कहता अम्न को डर कैद है ।५।


शक्तिशाली आज  भी  है  मुक्त  दोषों से यहाँ
और जग में बिन वजह भी यार कमतर कैद है।६।


घर गृहस्ती नाम  जिसका  है कहाँ यारो सहज
कैद में सहचर की देखो अब भी सहचर कैद है।७।


भूख से नित ये  परेशाँ  बंदिशों से वो दुखी
फर्क क्या आजाद रामू और अकबर कैद है।८।

मौलिक-अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

Views: 851

Comment

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Comment by Mohammed Arif on October 24, 2018 at 11:06pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी आदाब,

                         बहुत ही उम्दा शे'रों से सुसज्जित ग़ज़ल । दिली मुबारकबाद कुबूल करें । बाक़ी गुणीजन कह चुके हैं ।

Comment by Balram Dhakar on October 24, 2018 at 10:48pm

आ० लक्ष्मण जी, बहुत खूबसूरत ग़ज़ल हुई। दिली मुबारक़बाद क़ुबूल फ़रमाएं।

सादर।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 24, 2018 at 6:10pm

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन । गजल की प्रशंसा के लिए आभार।

नीलेश जी की सलाह संज्ञान में ले ली है । सादर...

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 24, 2018 at 6:07pm

आ. भाई नीलेश जी, सादर आभिवादन ।गजल पर उपस्थिति , प्रशंसा और सलाह के लिए आभार । मिसरे में बदलाव कर दिया, देखियेगा ।

Comment by Samar kabeer on October 24, 2018 at 4:10pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

जनाब निलेश जी की बातों का संज्ञान लें ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 24, 2018 at 1:41pm

आ. लक्ष्मण जी
अच्छी  ग़ज़ल हुई  है .
मिसरों   में वाक्य रचना पर ध्यान दें   
जैसे 
हो न जाये यार हाकिम बस ये रखना ध्यान तुम.. ऐसा लगता है कि अपने किसी मित्र को सत्ता नहीं देना चाहते हों आप.. हालाँकि शेर का भाव भिन्न है ..
इसी प्रकार से बहुत सी छोटी बातों पर फोकस आवश्यक है
सादर 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 24, 2018 at 12:11pm

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार ।

Comment by TEJ VEER SINGH on October 24, 2018 at 10:50am

हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"जी। बेहतरीन गज़ल।

भूख से नित ये  परेशाँ  बंदिशों से वो दुखी
फर्क क्या आजाद रामू और अकबर कैद है।८।

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