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आज लहरों ने की बातें मुझसे 

बोलीं 

तुम सोचती हो तुम हो बहादुर 

समय से तुम लडती हो 

मूर्ख हो तुम 

जो यह सोचकर दम भरती हो| 

और वह इठला कर चली गयी 

दूर 

वहीं जहाँ से वह आयीं थी 

किनारे तक 

और वहाँ पड़े चट्टानों से 

टकरा-टकरा कर रही थी 

बातें उनसे, 

कह रहे थे चट्टान उनसे 

रुक जाओ 

करीब आप मेरे ऊपर से 

न यूँ बह जाओ 

रुको कुछ घड़ी 

की हम तपते हैं 

और देखो हम बन गये है ठोस और जड़ 

लहरें कुछ देर करती रहीं 

अटखेलियाँ 

चट्टान पर से गोल-गोल घूमकर 

फिर समां गयीं उसी धारा में 

जहाँ से वह आई थीं 

अब वह और धारा एक हो चुकी थीं 

कुछ देर मैं वहीँ खडी रही 

यह सोच कर कि 

आएँगी फिर लहरें 

करीब मेरे और करेंगी बातें मुझसे 

पर अब वह नदी के प्रवाह में 

बह रही थी और दूसरी ओर 

वह निकल पड़ी थी 

शायद हवा से बातें करने 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Views: 682

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Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on November 3, 2018 at 10:29pm

धन्यवाद आदरणीय विजय निकोरे जी| 

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on November 3, 2018 at 10:28pm

धन्यवाद आदरणीय समर भाई | 

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on November 3, 2018 at 10:28pm

धन्यवाद् आदरणीय तेज वीर सिंह जी| 

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 30, 2018 at 1:59am

बेहतरीन बिम्बात्मक अभिव्यक्ति। हार्दिक बधाई आदरणीया कल्पना भट्ट  साहिबा। कुछ-एक टंकण-त्रुटियां रह गईं हैं, कृपया देख लीजिएगा।

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on October 28, 2018 at 8:42am

आदरणीया कल्पना जी बहुत बेहतरीन रचना सुंदर औऱ सार्थक रचना के लिए बहुत बहुत बधाई, आंशिक तंकड़ त्रुटि देख लीजिएगा 

Comment by vijay nikore on October 28, 2018 at 1:41am

इस अच्छी रचना के लिए हार्दिक बधाई, आदरणीया कल्पना जी।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 27, 2018 at 7:48pm

अच्छी कविता हुई है आदरणीया.. सादर

Comment by Samar kabeer on October 27, 2018 at 3:56pm

बहना कल्पना भट्ट जी आदाब,अच्छी कविता हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by TEJ VEER SINGH on October 26, 2018 at 1:03pm

हार्दिक बधाई आदरणीय कल्पना भट्ट रौनक जी। बेहतरीन कविता।

कृपया ध्यान दे...

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