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ज़िंदगी   .... 

तुम आईं
तो संवरने लगी
ज़िंदगी


साथ जीने
और मरने के
अर्थ
बदलने लगी
ज़िंदगी


मौसम बदला
श्वासें बदलीं
अभिव्यक्ति की साँझ में
बिखरने लगी
ज़िंदगी


प्रतीक्षा
मौन हुई
शब्द शून्य हुए
चुपके-चुपके
स्मृति के परिधान में
सिमटने लगी
ज़िंदगी


सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 516

Comment

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Comment by Sushil Sarna on November 1, 2018 at 7:43pm

आदरणीय नरेंदर सिंह चौहान जी सृजन आपकी मधुर प्रशंसा का आभारी है।

Comment by Sushil Sarna on November 1, 2018 at 7:42pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब सृजन के भावों पर आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया एवं सुझाव का दिल से आभार। ।

Comment by Sushil Sarna on November 1, 2018 at 7:41pm

आदरणीय डॉ छोटेलाल सिंह जी सृजन के भावों पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on November 1, 2018 at 7:40pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी आपकी मधुर प्रशंसा का दिल से आभार ।

Comment by narendrasinh chauhan on October 29, 2018 at 3:21pm

खुब सुन्दर रचना सर

Comment by Samar kabeer on October 28, 2018 at 5:29pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,अच्छी कविता हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

' तुम आई'--"तुम आईं"

' बदलनी लगी'--"बदलने लगी"

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on October 28, 2018 at 8:31am

आदरणीय सुशील सरना जी बहुत बेहतरीन सुंदर औऱ सार्थ रचना के लिए बधाई

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 27, 2018 at 7:19pm

आ. भाई सुशील जी, अच्छी रचना हुयी है । हार्दिक बधाई ।

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