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आग की तरह के  शब्द,
मेरी आत्मा में जलाते है ,
मैं अपने आप को खोया पाता हूँ ,
नियंत्रण, रखना प्रतीत नहीं हो सकता है,
इरादे लटक जाते 
फांसी पे एक ध्रुव की  ,
और प्यार धुंधला हो जाता  है,
आँखों की कालिमा से 

"मौलिक व अप्रकाशित" 

Views: 480

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Comment by vijay nikore on November 28, 2018 at 3:08pm

इस प्र्स्तुति के लिए बधाई, आदरणीय नरेन्द्रसिंह जी।

Comment by narendrasinh chauhan on November 27, 2018 at 8:38pm

सुक्रिया आप सब महानुभव को...

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 26, 2018 at 7:14pm

आ. भाई नरेंद्र जी, हार्दिक बधाई ।

Comment by राज़ नवादवी on November 25, 2018 at 8:56pm

आदरणीय नरेन्द्र चौहान साहब, इस सुन्दर प्रस्तुति पे हार्दिक बधाई. सादर 

Comment by Samar kabeer on November 25, 2018 at 5:09pm

इस प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें,जनाब चौहान साहिब ।

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