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मखमली से फूल नाज़ुक पत्तियों को रख दिया

शाम होते ही दरीचे पर दियों को रख दिया

 

लौट के आया तो टूटी चूड़ियों को रख दिया

वक़्त ने कुछ अनकही मजबूरियों को रख दिया

 

आंसुओं से तर-बतर तकिये रहे चुप देर तक  

सलवटों ने चीखती खामोशियों को रख दिया

 

छोड़ना था गाँव जब रोज़ी कमाने के लिए

माँ ने बचपन में सुनाई लोरियों को रख दिया 

 

भीड़ में लोगों की दिन भर हँस के बतियाती रही 

रास्ते पर कब न जाने सिसकियों को रख दिया

 

इश्क के पैगाम के बदले तो कुछ भेजा नहीं

पर मेरी खिड़की पे उसने तितलियों को रख दिया

 

नाम जब आया मेरा तो फेर लीं नज़रें मगर

भीगती गजलों में मेरी शोखियों को रख दिया

 

चिलचिलाती धूप में तपने लगी जब छत मेरी

उनके हाथों की लिखी कुछ चिट्ठियों को रख दिया 

 

कुछ दिनों को काम से बाहर गया था शह्र के

पूड़ियों के साथ उसने हिचकियों को रख दिया

 

कुछ ज़ियादा कह दिया, वो चुप रही पर लंच में

साथ में सौरी के मेरी गलतियों को रख दिया

 

बीच ही दंगों के लौटी ज़िन्दगी ढर्रे पे फिर

शह्र में जो फौज की कुछ टुकड़ियों को रख दिया

 

कुछ दलों ने राजनीती की दुकानों के लिए

वोट की शतरंज पे फिर फौजियों को रख दिया

 

मौलिक व् अप्रकाशित 

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Comment by Balram Dhakar on February 11, 2019 at 11:06pm

आदरणीय दिगम्बर जी, बहुत ख़ूबसूरत अशआर हुए हैं। शेर दर शेर दाद के साथ मुबारक़बाद क़ुबूल फ़रमाएं।

सादर।

Comment by Samar kabeer on January 27, 2019 at 2:21pm

मेरे कहे को मान देने के लिए धन्यवाद, आप चाहें तो यहाँ भी एडिट कर सकते हैं ।

Comment by दिगंबर नासवा on January 27, 2019 at 12:25pm

महेंद्र जी आपका आभार है ... मैं भी अभी विद्यार्थी ही हूँ इस ग़ज़ल गंगा में ... 

आपको शेर पसंद आया तो लिखना सार्थक हुआ ...

Comment by दिगंबर नासवा on January 27, 2019 at 12:23pm

आदरणीय समर कबीर साहब ... आपका बताया मिसरा बहुत ही सुन्दर है ... मूल ग़ज़ल में बदलाव करना ठीक रहेगा .. आपका आभार ... 

कह दिया ज्यादा ... आपका कहना सही है कई बार सही शब्द से ज्यादा प्रचलित शब्द के पीछे गलतियाँ हो जाती हैं ... आपका आभार नए मिसरे के लिए ... 

Comment by Mahendra Kumar on January 27, 2019 at 11:24am

कुछ दलों ने राजनीती की दुकानों के लिए

वोट की शतरंज पे फिर फौजियों को रख दिया ...सामयिक शेर!

इस बढ़िया ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए आदरणीय दिगंबर नासवा जी. यदि आप ग़ज़ल के अरकान भी लिखे देते हम जैसे नये सीखने वालों के लिए बेहतर रहता. सादर.

Comment by Samar kabeer on January 27, 2019 at 10:51am

'शाम होते ही चोबारे पर दियों को रख दिया'

मेरे नज़दीक 'चौबारे' को "चुबारे" करना उचित नहीं,इस मिसरे को चाहें तो यूँ कर सकते हैं:-

'शाम होते ही दरीचे पर दियों को रख दिया'

'कह दिया ज्यादा, रही चुप वो, मगर फिर लंच में'

इस मिसरे में सहीह शब्द "ज़ियादा" इसलिए मात्रा पतन मुमकिन नहीं,इस मिसरे को यूँ कर सकते हैं:-

'कुछ ज़ियादा कह दिया,वो चुप रही पर लंच में'

 

Comment by दिगंबर नासवा on January 26, 2019 at 11:04pm

इस ग़ज़ल का कुछ बातों पर मैं अपनी राय रखना चाहूंगा चौबारा का जिस जगह इस्तेमाल हुआ है वहां मुझे लग रहा है कि रुक्न के हिसाब से लफ्ज़ का इस्तेमाल नही हुआ है कृपया स्पष्ट कीजिए गा। इसी तरह ज्यादा शब्द 122 के वश में है इसका प्रयोग 22 के वश में हुआ है इसे भी देखियेगा।

आदरणीय रवि जी ... मैं अधिकतर ध्वनि को ही मूल रख कर लफ़्ज़ों का प्रयोग करता हूँ अतः इस बात पर उस्तादों की राय ज्यादा महत्वपूर्ण होगी ... आदरणीय समर कबीर इस विषय पे कुछ बताएँगे तो मुझे भी जानकारी हो जायेगी ...

आपका त्वरित सुझाव बहुत अच्छा है ... आपकी पंक्तियाँ सहज लग रही हैं ... 

आपको शेर अच्छे लगे ... ये मेरा सौभाग्य है ... आपका आभार बहुत बहुत ...

Comment by Ravi Shukla on January 26, 2019 at 9:52pm

आदरणीय दिगंबर साहब बहुत अच्छी गजल आपने कहीं कई नए बिम्ब आप लेकर आए बहुत-बहुत स्वागत है इस ग़ज़ल का कुछ बातों पर मैं अपनी राय रखना चाहूंगा चौबारा का जिस जगह इस्तेमाल हुआ है वहां मुझे लग रहा है कि रुक्न के हिसाब से लफ्ज़ का इस्तेमाल नही हुआ है कृपया स्पष्ट कीजिए गा। इसी तरह ज्यादा शब्द 122 के वश में है इसका प्रयोग 22 के वश में हुआ है इसे भी देखियेगा।

भीड़ में लोगों की दिन भर हँस के बतियाती रही 

रास्ते पर कब न जाने सिसकियों को रख दिया ।बहुत अच्छा लगा ये शेर 

एक त्वरित सझाव भी है । किंतु लेखकीय स्वतंत्रता सर्वोपरि है 

आ गई दंगों से उजड़ी जिंदगी फिर राह पर

अच्छी ग़ज़ल के लिए एक बार उन्हें दिली मुबारकबाद कुबूल कीजिए

 

Comment by दिगंबर नासवा on January 25, 2019 at 10:07am

बहुत शुक्रिया आदरणीय समीर कबीर साहब ... गलती का सुधार कर लिया है ...

उम्मीद है आपका आशिर्वाद, आपका साथ मिलता रहेगा ...  

Comment by Samar kabeer on January 24, 2019 at 11:11pm

जनाब दिगंबर नासवा जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

'भीड़ में लोगों की दिन भर हंस के बतियाती रही '

इस मिसरे में 'हंस' को "हँस" कर लें ।

कृपया ध्यान दे...

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