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ख़्वाब ... (क्षणिका )

ख़्वाब ... (क्षणिका )

तैरता रहा तुम्हारा अक्स
मेरे ख़्वाबों के प्याले में
माहताब बनकर
मैं निहारता रहा
अब्र में
बिखरता ख़्वाब
छलिया माहताब में

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 532

Comment

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Comment by Sushil Sarna on July 7, 2019 at 6:56pm

आदरणीय  गिरिराज भंडारी' जी सृजन पर आपकी आत्मीय प्रशंसा का दिल से आभार।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 5, 2019 at 12:15pm

आदरणीय सुशील भाई ,अच्छी लगी आपकी क्षणिका , बधाई !

Comment by Sushil Sarna on June 27, 2019 at 1:45pm

आदरणीय  प्रदीप देवीशरण भट्टजी सृजन पर आपकी मन मुदित करती आत्मीय प्रशंसा का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on June 27, 2019 at 1:45pm

आदरणीय समर कबीर साहिब ,आदाब .... सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार।

Comment by Samar kabeer on June 24, 2019 at 11:46am

जनाब सुशील सरना जी आदाब,अच्छी क्षणिका हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by प्रदीप देवीशरण भट्ट on June 24, 2019 at 11:37am

बेहतरीन क्षणिका

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