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हमारा दीपक - लघुकथा -

हमारा दीपक - लघुकथा -

"अरे ज्योति देखो, अपना दीपक आज  दिये  बनाना सीख रहा है।"

"नहीं, बिलकुल नहीं। मेरा दीपक यह गंदा काम नहीं सीखेगा। सारे दिन मिट्टी से लथपथ बने रहो।"

"ज्योति, कैसी बात करती हो| यह तो हमारा पुश्तैनी धंधा है। मेरी सात पीढियाँ यही सब करती रही हैं। उसी से घर गृहस्थी चली है।"

"वह सब गुजरे जमाने की बातें हैं। तुम्हारे पुरखे अनपढ़ थे। उन्होंने शिक्षा की ओर ध्यान नहीं दिया।"

"तुम्हारी बात से मैं सहमत हूँ लेकिन....।"

"लेकिन वेकिन कुछ नहीं, मैंने बोल दिया ना। मेरा दीपक पढ़ लिख कर मेरे भाई की तरह सरकारी नौकर बनेगा।"

"ज्योति, तुम्हारे विचार अच्छे हैं। मैं भी चाहता हूँ कि दीपक पढ़ लिख कर बड़ा आदमी बने।लेकिन कल क्या होने वाला है किसे पता?"

"तो तुम क्या कहना चाहते हो?"

"मेरी राय है कि दीपक खूब मन लगाकर पढ़े।हर संभव कोशिश करे कि उसे अच्छी सी नौकरी मिल जाय मगर आजकल नौकरी मिलना भी इतना आसान कहाँ है?"

"यह बात तो है।"

"इसीलिये मेरा मानना है कि दीपक पढ़ाई के साथ साथ, अगर यह काम भी सीख लेगा तो बुरे वक्त में अपना हुनर ही काम आयेगा।"

"ठीक है फिर मुझे कोई ऐतराज नहीं है।"

माँ की सहमति मिलते ही बाप बेटा दोनों तन्मयता से अपने कार्य में लग गये। उनकी लगन देख कर उनके बनाये दिये भी मुस्कुराने लगे।

मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by TEJ VEER SINGH on January 25, 2020 at 11:20am

हार्दिक आभार आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर जी।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 17, 2020 at 6:57am

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन । अच्छी कथा हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by TEJ VEER SINGH on November 1, 2019 at 7:06pm

हार्दिक आभार आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी।

Comment by नाथ सोनांचली on November 1, 2019 at 1:29pm

आद0 तेजवीर सिंह जी सादर अभिवादन। लघुकथा का अच्छा प्रयास है पर.... इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार कीजिये।

Comment by TEJ VEER SINGH on October 28, 2019 at 6:47pm

हार्दिक आभार आदरणीय समर कबीर साहब जी। आदाब।

Comment by Samar kabeer on October 28, 2019 at 4:00pm

जनाब तेजवीर सिंह जी आदाब,अच्छी लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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