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ग़ज़ल (बह्र -फेलुन) यह ग़ज़ल दुनिया की सबसे छोटी ग़ज़ल है। इसे "गोल्डन बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स" में शामिल किया गया है ।

*जीवन
उलझन ।

* सूने
आँगन ।

* घर-घर
अनबन ।

* उजड़े
गुलशन ।

* खोया
बचपन ।

*भटका
यौवन ।

* झूठे
अनशन ।

* ख़ाली
बरतन ।

* सहमी
धड़कन ।

.
मौलिक और अप्रकाशित ।

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Comment by Mohammed Arif yesterday
बहुत-बहुत आभार आदरणीय बृजेश कुमार जी । मेरा लेखन सार्थक हो गया ।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' yesterday
बहुत बहुत बधाइयाँ आदरणीय ..
Comment by Mohammed Arif on Sunday
आदरणीय अजय तिवारी जी आदाब, मेरी विश्व की सबसे छोटी मात्रा (फेलुन) पर अपनी अमूल्य प्रतिक्रिया से सम्मानित करने का बहुत-बहुत आभार ।
Comment by Mohammed Arif on Sunday
आदरणीया वंदना जी आदाब, विश्व की सबसे कम मात्रा वाली मेरी ग़ज़ल पर प्रतिक्रिया देकर सम्मानित करने का बहुत-बहुत आभार ।
Comment by vandana on Sunday

वाह ग़ज़ब की सोच वाकई कमाल आदरणीय बहुत बहुत बधाई 

Comment by Ajay Tiwari on Sunday

आदरणीय आरिफ साहब,

उपलब्धि के लिए शुभकामनायें.

सादर 

Comment by Mohammed Arif on October 13, 2017 at 11:29pm
आदरणीय मनोज कुमार मिश्रा जी ग़ज़ल पर प्रतिक्रिया देने और सफल बनाने का बहुत-बहुत आभार ।
Comment by Manoj kumar Ahsaas on October 13, 2017 at 10:45pm
सादर प्रणाम कबीर साहब
आपके आदेशानुसार मैं अपने सृजन पर ध्यान केंद्रित कर रहा हूँ
अपनी टिप्पनी हटा रहा हूँ
आपसे मंच से आरिफ साहब से माफी चाहता हूं
सादर
Comment by Samar kabeer on October 13, 2017 at 8:33pm
जनाब मनोज साहिब आदाब,आप बेकार की बहस कर रहे हैं,'फेलुन'एक हो या सो ग़ज़ल हो जायेगी,पूरी ग़ज़ल में कथ्य कहीं नहीं भटका, आपने जो फिलबदीह ग़ज़ल कही है उसमें कथ्य नहीं हैं,अपने सृजन पर ध्यान केन्द्रित करें ।
Comment by Mohammed Arif on October 13, 2017 at 8:36am
आदरणीय मनोज कुमार "अहसास"जी आदाब, मेरी विश्व की सबसे छोटी (चार मात्रा) वाली ग़ज़ल पर आपकी प्रतिक्रिया उपरांत पूछना चाहूँगा कि:-
(1) क्या यह ग़ज़ल नहीं ? तो आख़िर क्यों ?
(2) क्या इस ग़ज़ल में कथ्य (कहन) नहीं है क्या ?
(3) क्या यह ग़ज़ल विधान के मापदंडों पर खरी आपको खरी नज़र नहीं आ रही है ? अगर नहीं तो स्पष्ट करें ?
(4) आपको इस ग़ज़ल में शे'र कहाँ नज़र नहीं आ रहे हैं? आपकी नज़रों का धोखा है या कोई और ।
(5) आपको इस ग़ज़ल में शिल्प कहाँ नज़र नहीं आ रहा है ?
(6) गूढ़ संप्रेषणीयता , गहन विचार , ग़ज़ल की गहराई कहाँ नज़र नहीं आ रही है ? ज़रा विस्तार बताना मेरे भाई ।
(7) देश के नामचीन अरज़ी आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब, प्रसिद्ध छंद शास्त्री आदरणीय सौरभ पांडे जी और ओबीओ मंच के अन्य विद्वानजनों की इस ग़ज़ल पर प्रतिक्रिया क्या बेईमानी है ? क्या इन्होने सोच समझकर प्रतिक्रिया नहीं या केवल आपने ही सोच समझकर अपनी प्रतिक्रिया दी है ?
(8) इस तरह के प्रयोग आपको बेईमानी क्यों लगते हैं ? क्या नये-नये प्रयोग नहीं होना चाहिए ?
आशा है आप मेरे उक्त सारे प्रश्नों का जवाब देंगे । सादर ।

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