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जो चाहेगा वो हंस लेगा - डॉo विजय शंकर

बातें ,
वादे ,
इरादे ,
जब पूरे न हों
तो बात बदल दो ,
इरादे बदल दो ,
चुटकुले सुना दो,
लोगो को हंसा दो ,
इस पर हंस लो ,
उस पर हंस लो ,
जिस पर चाहो
उस पर हंस लो ,
खुद पर हंस लो।
खुद पर ?
खुद पर क्यों ?
नहीं , खुद पर मत हंसो।
ये काम कल कोई और कर लेगा ,
जो चाहेगा वो कर लेगा ,
जो चाहेगा वो हंस लेगा।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Dr. Vijai Shanker on May 26, 2017 at 7:08pm
आदरणीय ब्रजेश कुमार ब्रज जी , आपका आभार एवं धन्यवाद, सादर।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 24, 2017 at 8:06pm
अच्छा कटाक्ष है आदरणीय..सादर
Comment by Dr. Vijai Shanker on May 24, 2017 at 7:51am
आदरणीय नरेंद्र सिंह जी , अआप्का बहुत बहुत आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on May 24, 2017 at 7:51am
आदरणीय मोहम्मद आरिफ जी , आपकी विश्लेषणात्मक विशद प्रतिक्रिया के लिए ह्रदय से आभार और बधाइयों के लिए धन्यवाद , सादर।
Comment by narendrasinh chauhan on May 23, 2017 at 11:56am

बहोत खूब 

Comment by Mohammed Arif on May 22, 2017 at 1:02pm
वाह!वाहबहुत ख़ूब !वल्लाह कमाल की कविता है । सच है अपने ऊपर पर हँसने का अधिकार औरों को भी दे देना चाहिए ताकि हम जान तो सके कि हममें कौन-कौन सी ग़लतियाँ हैं , हमारा चारित्रिक गठन किस स्तर का है । लेकिन ये अधिकार भी हम औरों को कब देते है? नहीं देते हैं और अंतर्मन में भी झाँकने का अवकाश भी हमारे पास नहीं है । लख-लख बधाइयाँ स्वीकार करें । सादर ।

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