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लोकतंत्र की करवट ( लघु-कथा ) - डॉo विजय शंकर

नेता जी क्षेत्र का दौरा करके लौट रहे थे।
कुछ निराश , कुछ हताश। क्षेत्र वाले अपनी सुना रहे थे , नेता जी अपनी लगाए थे। नेता जी को कोई बात बनती नज़र नहीं आ रही थी।
" फिर आते हैं ", कह कर वापस हो लिए।
कार में बड़बड़ाते हुए निजी स्टाफ से बोले ," ये नहीं सुधरेंगे " . थोड़ा रुक कर फिर बोले ," हमारे सुधरने का इंतज़ार करेंगे " .

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Dr. Vijai Shanker on May 4, 2016 at 6:42pm
आदरणीय ओमप्रकाश क्षत्रिय जी , बहुत बहुत आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on May 4, 2016 at 6:42pm
आदरणीय तेजवीर सिंह जी , बहुत बहुत आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on May 4, 2016 at 8:50am
प्रिय मिथिलेश वामनकर जी , मुझे लगता है जनता कुछ कुछ समझने लगी है , अभी उनकों यह समझ में नहीं आ रहा है। रचना पर उपस्थिति एवं प्रशांति हेतु आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on May 4, 2016 at 8:47am
आदरणीय सुशील सरना जी , आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by Omprakash Kshatriya on May 4, 2016 at 7:58am
आदरणीय विजय शंकर जी शीर्षक को सार्थक करती बढ़िया लघुकथा रची है आप ने. बधाई इस लघुकथा के लिए.
Comment by TEJ VEER SINGH on May 3, 2016 at 4:24pm

हार्दिक बधाई आदरणीय डॉ विजय शंकर जी!बहुत सुंदर लघुकथा!नेताओं की पैतरेबाज़ी को अब जनता भी खूब समझने लगी है!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 3, 2016 at 3:51pm

आदरणीय विजय शंकर सर, आज राजनेता और आमजन के बदलते समीकरणों को क्या खूब उभारा है आपने. इस शानदार लघुकथा पर हार्दिक बधाई. सादर 

Comment by Sushil Sarna on May 3, 2016 at 1:05pm

आदरणीय विजय शंकर जी एक गहनता को समेटे इस सुंदर लघुकथा की प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई। 

Comment by Dr. Vijai Shanker on May 3, 2016 at 4:09am
आदरणीय गणेश जी " बागी " जी , बहुत सही प्रतिक्रिया , नेता जी कच्चे , अब यह कच्चापन लोग समझने लगे हैं , क्योंकि लोग खुद पक चुके हैं। रचना पर बधाई के लिए ह्रदय से आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on May 3, 2016 at 4:05am
आदरणीय सुनील कुमार वर्मा जी , रचना पर बधाई के लिए आभार एवं धन्यवाद , सादर।

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