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कान और कांव कांव(लघुकथा)

कान और कांव कांव 
*****
एक आदमी(नकाब में) :तेरे कान कौवे ले गए।
दूसरा:एं?
पहला:और क्या?वो देखो, कौवे उड़ते जा रहे हैं।
दूसरा व्यक्ति दो कौवों के पीछे दौड़ने लगा। उसके पीछे एक एक कर लोग दौड़ने लगे। कारवां बन गया....गुबार देखते बनता था ... कारवां के पिछले हिस्से में दौड़ते हांफते लोग एक दूसरे से सवाल करते कि आखिर वे कहां जा रहे हैं,क्या कर रहे हैं? हां, आगे के हिस्से की आवाज में आवाज जरूर मिलाते कि ' वापस दो,वापस दो...।' कोई कोई तो ' वापस लो..वापस लो..' की भी आवाज उठाता।
भीड़ के पृष्ठ भाग में उड़ते दो कौवे आपस में बातें कर रहे थे।पहला," ये लोग कान वापस मांग रहे हैं या आंखे निकलवाने को आमादा हैं?"
दूसरा, " अरे भाई,जिन्हें अपने कान का पता नहीं,वे आंखें निकाले जाने पर भी क्या खाक समझेंगे।"
" सच है...सच है ।" फिर कांव कांव की आवाज वातावरण में गूंज गई।लोग पीछे पीछे दौड़ने लगे।
"मौलिक व अ प्र काशित"

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Comment by Manan Kumar singh on February 25, 2020 at 1:02pm

आपका बहुत बहुत आभार आदरणीय चंद्रेश जी।

Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on February 25, 2020 at 1:00pm

गजब की रचना। बहुत-बहुत बधाई इस सृजन हेतु।

Comment by Manan Kumar singh on February 5, 2020 at 2:42pm

जी शुक्रिया।

Comment by Manan Kumar singh on February 5, 2020 at 2:42pm

जी शुक्रिया।

Comment by Samar kabeer on January 19, 2020 at 8:36pm

जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,अच्छी लघुकथा लिखी आपने,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 14, 2020 at 7:37am

आ. भाई मनन जी, अच्छी कथा हुई है । हार्दिक बधाई।

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