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ये बहुत दुखद है की आज कल साहित्य का भी राजनीतिकरण हो रहा है पुरस्कार लौटाना उस साहित्य उस लेखन का अपमान है जिसकी बदौलत वो पुरस्कार मिला है और इस आग में उसे भी धकेला जा रहा है जो नहीं चाहता है .सामयिक मुद्दे पर आपने लघु कथा लिखी है आ० सौरभ जी,जिसकी जितनी भी सराहना की जाए कम ही होगी ,आपकी कहानी थोडा देरी से आई अच्छा हुआ वो भी अभी नोटिफिकेशन में दिख गई वरना अभी फिर बाहर जाना है बाद में ही पढ़ पाती तथा प्रतिक्रिया दे पाती |आपको इस शानदार लघु कथा के लिए हार्दिक बधाई |
आदरणीय सौरभ सर, शानदार लाजवाब और उत्कृष्ट लघुकथा हुई है. एक लेखक के दर्द को शाब्दिक करने के क्रम में प्रदत्त विषय को लघुकथा में जिस तरह सम्मिलित किया है वह चकित करता है. अद्भुत और चमत्कृत करती लघुकथा. इन पंक्तियों का प्रभाव बहुत गहरे तक होता है-
"इनकी भूमिका ? वेरी गुड ! अच्युत बाबू, कौड़ी के तीन नहीं तैंतालिस मिलते हैं, तैंतालिस.. कलम घिस-घिस के मर जाने वाले .. होश में आइये ! दो घण्टे से आपको यही समझा रहा हूँ मैं !.. "
"हाँ हाँ हाँ, मान गये हैं !.. मगर क्या आदमी है ये साहब ! .. पूरा ऊँट है ऊँट ! .. सीधा तो सोचता ही नहीं.. सीधा चलने की तो बात ही छोड़िये.."
साहित्य को साधना मानने वालों की यही गत होती है. उन्हें ऐसी ही उलाहना और अपमान का सामना करना पड़ता ही है. लघुकथा विधा में आपकी शैली विशिष्ट है यही कारण है कि हमेशा की तरह आपकी इस प्रस्तुति से भी बहुत गहरे तक प्रभावित हुआ हूँ. प्रयास करता हूँ कि आपकी कृतियों से कुछ सीख सकूं. इस सार्थक प्रस्तुति पर आपको बहुत बहुत बधाई और नमन
सभी आत्मीयजनों को प्रस्तुति पर उत्साहवर्द्धन केलिए हार्दिक धन्यवाद ..
शुभ-शुभ
अच्छा प्रयास है, इससे ज्यादा और क्या कहा जाये. क्योंकि आप दोबारा तो अपनी रचना और टिप्पणियों पर आएंगे नहीं.
बढ़िया कथा ....समस्याए ही समस्याये हैं अपने देश में समाधान कम
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