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June 2014 Blog Posts

क्यूँ न हम जुल्फ हुये सोचकर ये खलता है

२१२२ ११२२ १२१२ २२
इश्क की मौज में जब दिल में कुछ उछलता है
चांदनी रात में शोलों सा तन ये जलता है

राहे मंजिल पे यूं तो गुल तमाम थे लेकिन
आँख जब से लड़ी तन बर्फ सा पिघलता है

बंदिशें तोड़ के कह दे तू इस जमाने से
जलने वाला तो बात बात पे ही जलता है

चूम लेती हैं हसीं रुख को जब कभी जुल्फें
क्यूँ न हम जुल्फ हुये सोचकर ये खलता है

जुल्फ की छांव का अहसास तो किया होता
घर के साए से यकीनन ये दिल बहलता है

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Dr Ashutosh Mishra on June 1, 2014 at 2:11pm — 19 Comments

आखिर कैसा देश है ये ? --- अरुण श्री

आखिर कैसा देश है ये ?

- कि राजधानी का कवि संसद की ओर पीठ किए बैठा है ,

सोती हुई अदालतों की आँख में कोंच देना चाहता है अपनी कलम !

गैरकानूनी घोषित होने से ठीक पहले असामाजिक हुआ कवि -

कविताओं को खंखार सा मुँह में छुपाए उतर जाता है राजमार्ग की सीढियाँ ,

कि सरकारी सड़कों पर थूकना मना है ,कच्चे रास्तों पर तख्तियां नहीं होतीं !

पर साहित्यिक थूक से कच्ची, अनपढ़ गलियों को कोई फर्क नहीं पड़ता !

एक कवि के लिए गैरकानूनी होने से अधिक पीड़ादायक है गैरजरुरी होना…

Continue

Added by Arun Sri on June 1, 2014 at 1:00pm — 23 Comments

कुहरा धना है गजल तरही गजल

2122 2122 2122

मत कहो आकाश में कुहरा धना है

जाल धुमते बादलो ने बस बुना है



धूप की चादर अभी फैली फिजा में

चाँदनी को चाँद से मिलना मना है



भूल से भी हम न तड़़पाये तुझे थे

दे गवाही आज वो तेरा अना है



फूल भी रोने लगे तब से चमन में

रौद देगा माली ही जब से सुना है



नींद भी तब से नहीं आती किसी को

आदमी शैतान ही जब से बना है



आज ये सुन  शर्म खुद रोने लगा क्‍यों

औरतो ने राह पर  बच्‍चा जना है



मौलिक एवं…

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Added by Akhand Gahmari on June 1, 2014 at 1:00am — 13 Comments

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