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Rajesh kumari's Blog – January 2013 Archive (4)

केक्टस ही तो उगेंगे

ना जाने कब तुमने चुपके से 

ये इश्क के बीज रोपित किये 

 मेरे सुकोमल ह्रदय में 

की मैं बांवरी हो गई 

तुम्हारी चाह  में ,सांस लेने लगी 

उस तिलस्मी फिजाँ  में 

रंग बिरंगे इन्द्रधनुष आकर लेने लगे 

मेरी रग रग  में  

ऐ  मेरे शिखर तुम्हारी  गगन चुम्बी चोटी  

भी अब सूक्ष्म और सुलभ लगने लगी 

मुहब्बत के नशे में चूर 

इश्क के जूनून में जंगली 

घास बन  ,फूलों के संग संग तुम्हारे 

बदन पर रेंगती…

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Added by rajesh kumari on January 25, 2013 at 11:36am — 10 Comments

(छंद त्रिभंगी एक प्रयास ) कर्म किये जा

{चार चरण मात्रा ३२ यति (१०,८,८,६) , चरणान्त समतुकांत तथा चरणान्त में जगण वर्जित,  अंत में गुरु (२)}



(1)निश्शंक  जिए जा , कर्म किये जा , ,फल की मत कर ,अभिलाषा 

भगवन सब जाने ,सब पहचाने , कृपा करेंगे   ,रख आशा 

कर मनन निरंतर ,हिय अभ्यंतर,तन मन सुख की ,परिभाषा

पर लोभ  बुरा है , क्षोभ  बुरा है,   पर मन  जीते   ,  मृदु  भाषा 

(2)

शिव हरि  नाम भजो ,मद बिषय तजो ,जितेंद्रिय नाम,सुख पाओ 

भज  दुर्गे अम्बा , माँ जगदम्बा ,मातु रूप  नौ  , …

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Added by rajesh kumari on January 23, 2013 at 11:01pm — 12 Comments

भर रही हुंकार सरहद लहू का टीका सजा के

ले गए मुंड काट कायर धुंध में सूरत छुपा के 

भर रही हुंकार सरहद लहू  का टीका सजा के 

नर पिशाचो के कुकृत्य अब सहे ना  जायेंगे 

दो के बदले दस कटेंगे अब रहम ना  पायेंगे

बे ज़मीर हो तुम दुश्मनी  के भी लायक नहीं

कहें जानवर तो होता उनका भी अपमान कहीं

होते जो इंसा ना जाते अंधकार में दुम दबा के 

भर रही हुंकार सरहद लहू  का टीका सजा के 

बारूद  के ज्वाला मुखी  को दे गए चिंगारी तुम

अब बचाओ अपना दामन मौत के संचारी तुम 

भाई कहकर  छल से…

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Added by rajesh kumari on January 17, 2013 at 11:12am — 16 Comments

श्वेत बर्फीला कश्मीर

उड़ेल दिए क्या नमक के बोरे ,या चाँदी  की किरचें  बिछाई 

लटके यहाँ- वहां  रुई के गोले  क्या  बादलों   की फटी रजाई 

मति मेरी  देख- देख चकराई |

डाल- डाल पर  जड़े कुदरत ने जैसे धवल नगीने चुन- चुन कर  

लगता कभी- कभी  जैसे धुन रहे …

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Added by rajesh kumari on January 13, 2013 at 7:08pm — 14 Comments

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