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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog – February 2016 Archive (6)

दवाई पेड़ पौधे हैं -ग़ज़ल

1222    1222    1222    1222

न जाने  हाथ में  किसके है ये पतवार  मौसम की

बदल पाया  न  कोई भी  कभी  रफ्तार मौसम की /1



सितम इस पार मौसम का दया उस पार मौसम की

समझ  चालें  न  आएँगी कभी  अय्यार मौसम की /2



अभी है पक्ष  में तो  मत  करो  मनमानियाँ इतनी

न जाने कब  बदल जाए  तबीयत यार मौसम की /3



उजाड़े  जा  रहा क्यों तू  धरा   से  रोज ही इनको

दवाई  पेड़  पौधे  हैं  समझ   बीमार  मौसम की /4



न आए  हाथ उतने  भी   लगाए  बीज थे जितने

पड़ी कुछ…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 24, 2016 at 11:55am — 13 Comments

बदजुबानी क्या कहें-ग़ज़ल ( लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’ )

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प्यार के  इस  माह  की यारो  कहानी क्या कहें

बिन किसी  के थम  गयी है जिंदगानी क्या कहें /1



यूँ  कभी  खुशियों के मौसम भी छलकती आँख थी

दर्द  से  हट  आँसुओं  के  अब  तो  मानी  क्या कहें /2



आजकल बैसाखियों पर वक्त जाने क्यों हुआ

थी कभी किससे जवाँ वो इक रवानी क्या कहें /3



आप कहते  हो  अकेलापन  सताता  है  बहुत

साथ  अपने  तो सदा  यादें  पुरानी  क्या कहें /4



खुश रहे बस हो …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 23, 2016 at 11:27am — 10 Comments

धन के बल पर नदी मुहाने -ग़ज़ल-(लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' )

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कौन कहेगा  यारो  बोलो बस्ती की मनमानी की

दोष लगाता हर कोई है गलती कहकर पानी की /1



राह रही जो नदिया की वो घर आगन सब रोक रहे

खादर  बंगर पाट रखी  है  नींव नगर रजधानी की /2



भीड़ बड़ी हर ओर  साथ  ही कूड़े का अम्बार बढ़ा

धन के बल पर नदी मुहाने आज पँहुच शैलानी की /3



हम को नादाँ  कहकर कोई बात न कहने देते पर

यार सयानों ने हर दम ही बात बहुत बचकानी की /4



माना सुविधाओं का यारा…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 16, 2016 at 12:23pm — 6 Comments

चोट खाकर देखिए-ग़ज़ल-(लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' )

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इस नगर में हर किसी को इक फसाना चाहिए

ऊँघते  को  ठेलते  का  इक  बहाना  चाहिए /1



कब से ठहरा ताल अब तो मारिए कंकड़ जरा

जिंदगी का लुत्फ  कुछ तो  यार आना चाहिए /2



बेबसी क्यों  ओढ़नी  जब हाथ लाठी कर्म की

द्वार किस्मत का चलो अब खटखटाना चाहिए /3



चोट खाकर देखिए खुद दर्द की तफतीस को

बोलना  फिर  दर्द में  भी  मुस्कुराना चाहिए /4



हो गयी हो पीर  पर्वत  हर दवा जब बेअसर

आँसुओं को किसलिए फिर छलछलाना चाहिए…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 15, 2016 at 12:22pm — 6 Comments

तुम्हारी सोच में फिरका -ग़ज़ल -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर "

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सदा सम्मान  इकतरफा  कहाँ तक  फूल  को दोगे

तिरस्कारों  की हर गठरी  कहाँ  तक शूल को दोगे /1



उठेगी  तो करेगी  सिर से  पाँवों तक बहुत गँदला

अगर तुम प्यार का कुछ जल नहीं पगधूल को दोगे /2



नदी  आवारगी  में  नित  उजाड़े  खेत  औ  बस्ती

कहाँ तक दोष इसका  भी कहो  तुम कूल को दोगे /3



तुम्हारी  सोच  में  फिरके  उन्हें ही पोसते हो नित

सजा  तसलीमा  रूश्दी को  दुआ मकबूल…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 9, 2016 at 11:00am — 12 Comments

भर कर जेबें रोज चढ़े है - ( ग़ज़ल ) -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर "

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सुनते सुनते  गीत प्रेम का क्या सूझी पुरवाई को

कोयल आँसू भर भर देखे आग लगी अमराई को /1



बात कहूँ तो बन जाएगी जग की यार हँसाई को

जैसे तैसे झेल रहा  हूँ  जालिम की रूसवाई को /2



दिन तो बीते आस में यारो शायद चलती राह मिले

किन्तु पुराने खत पढ़  काटा  रातों की तनहाई को /3



वो साहिल की रेत देख कर चाहे यूँ ही लौट गया

ख्वाबों में  देखेगा  लेकिन  दरिया की गहराई को /4



भर कर जेबें  रोज चढ़े है मस्ती  को सैलानी…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 3, 2016 at 12:05am — 16 Comments

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