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Tasdiq Ahmed Khan's Blog – March 2017 Archive (3)

ग़ज़ल (दोस्तों की महरबानी हो गई )

ग़ज़ल (दोस्तों की महरबानी हो गई )

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फ़ाईलातुन--फ़ाईलातुन --फाइलुन

यूँ न उनको बदगुमानी हो गई |

दोस्तों की महरबानी हो गई |

भूल बचपन के गये वादे सभी

उनको हासिल क्या जवानी हो गई |

नुकताची को क्या दिखाया आइना

उसकी फ़ितरत पानी पानी हो गई |

यूँ नहीं डूबा है मुफ़लिस फ़िक्र में

उसकी बेटी भी सियानी हो गई |

अजनबी के साथ क्या कोई गया

ख़त्म उलफत की कहानी…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on March 18, 2017 at 8:48pm — 6 Comments

ग़ज़ल (निगाहों से आँसू निकलते रहे )

ग़ज़ल

-------

(फऊलन -फऊलन -फऊलन -फअल )

क़ियामत की वो चाल चलते रहे |

निगाहें मिलाकर बदलते रहे |

दिखा कर गया इक झलक क्या कोई

मुसलसल ही हम आँख मलते रहे |

यही तो है गम प्यार के नाम पर

हमें ज़िंदगी भर वो छलते रहे |

मिली हार उलफत के आगे उन्हें

जो ज़हरे तअस्सुब उगलते रहे |

तअस्सुब की आँधी है हैरां न यूँ

वफ़ा के दिए सारे जलते रहे |

असर होगा उनपर यही सोच कर

निगाहों से आँसू…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on March 15, 2017 at 8:51pm — 16 Comments

ग़ज़ल (हसीनों में मुहब्बत ढूंढता है )

(मफ़ाईलुन-मफ़ाईलुन-फऊलॅन)

हसीनों में मुहब्बत ढूंढता है |

ज़मीं पर कोई जन्नत ढूंढता है |

दगा फ़ितरत हसीनों की है लेकिन

कोई इन में मुरव्वत ढूंढता है |

समुंदर से भी गहरी हैं वो आँखें

जहाँ तू अपनी चाहत ढूंढता है |

मिलेगा तुझको असली लुत्फ़ गम में

फरह में क्यूँ लताफत ढूंढता है |

हैं काग़ज़ के मगर हैं खूबसूरत

तू जिन फूलों में नकहत ढूंढता है |

सियासी लोग होते हैं…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on March 4, 2017 at 9:00pm — 10 Comments

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