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Featured Blog Posts – May 2017 Archive (3)

तरही गजल : फूल जंगल में खिले किन के लिये

2122 2122 212

कार्ड काफी था न लॉगिन के लिए

वो हमे भी ले गए पिन के लिए



चाँद पर जाकर शहद वो खा रहे

आप अब भी रो रहे जिन के लिए



शेर को आता है बस करना शिकार

फूल जंगल में खिले किन के लिए



गुठलियों के दाम भी वो ले गया

उसने शीरीं आम जब गिन के लिये



आ गई अब ब्रेड में बीमारियाँ

जी रहे थे क्या इसी दिन के लिए



आये थे जापान से कल लौट कर

फिर उड़े वो रूस बर्लिन के लिए



पास पप्पू एक दिन हो…

Continue

Added by Ravi Shukla on May 9, 2017 at 11:46am — 27 Comments

तरही ग़ज़ल (212-212-212-212)

(212-212-212-212)

मेरे सुर से तेरा सुर मिलाना हुआ

और जीवन मेरा इक तराना हुआ ॥



मैने देखी है इक चलती फ़िरती ग़ज़ल

है मिजाज इस लिए शायराना हुआ ॥



आइए हमनशी बैठिए पलकों पर

ये कहें  ख्वाब में कैसे आना हुआ ॥



थी दवा तो वही काम तब कर गई

जब तेरा अपने हाथों पिलाना हुआ ॥



वो भी लगने लगे अब मुझे अपने से

"जब से गैरों के घर आना जाना हुआ ॥"



हज़्म कैसे करेंगे मेरी ये ग़ज़ल

वो जो खाते हैं बारीक छाना हुआ ॥



देख के…

Continue

Added by Gurpreet Singh jammu on May 5, 2017 at 10:47am — 23 Comments

ग़ज़ल नूर की-रोज़ जो मुझ को नया चाहती है

२१२२/११२२/२२ (११२)

रोज़ जो मुझ को नया चाहती है
ज़िन्दगी मुझ से तू क्या चाहती है?
.
मौत की शक्ल पहन कर शायद
ज़िन्दगी बदली क़बा चाहती है.
.
मशवरे यूँ मुझे देती है अना
जैसे सचमुच में भला चाहती है.
.
इक  सितमगर जो  मसीहा भी न हो,
नई दुनिया वो  ख़ुदा चाहती है.
.
“नूर’ बुझ जाये चिराग़ों की तरह
क्या ही नादान हवा चाहती है. 
.
निलेश"नूर"

मौलिक/ अप्रकाशित 

Added by Nilesh Shevgaonkar on May 2, 2017 at 2:00pm — 34 Comments

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