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बृजेश कुमार 'ब्रज''s Blog – May 2017 Archive (5)

ग़ज़ल...क्या क्रांति की है दुन्दभि या सिर्फ ये उफान है

मुफाइलुन मुफाइलुन मुफाइलुन मुफाइलुन

1212 1212 1212 1212

सुदूर उस तरफ जहाँ झुका वो आसमान है

वहीँ उसी दयार में गरीब का मकान है



ये आजकल जो शोर है शहर शहर गली गली

क्या क्रांति की है दुन्दभि या सिर्फ ये उफान है



चढ़ाव ज़िन्दगी का ज्यूँ मचलती है कुई लहर

कदम जरा सँभल के रख बहुत खड़ी ढलान है



जड़ों से जो जुदा हुये जमीन भी न पा सके

​​बिखर गये वो टूटकर समय का ये बयान है



ये प्यार की छुअन हुई या कसमकस ए ज़िन्दगी

बृजेश के ललाट पे जो चोट… Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 28, 2017 at 6:26pm — 12 Comments

ग़ज़ल.. जला दो दीप उल्फत के कभी काशी मदीने में

1222 1222 1222 1222

उठा लो हाथ में खंज़र लगा दो आग सीने में

धरा है क्या नजाकत में नफासत में करीने में



बड़े खूंरेज कातिल हो जलाया खूब इन्सां को

जला दो दीप उल्फत के कभी काशी मदीने में



उठी लहरें हजारों नागिनें फुफकारती जैसे

न कोई बच सका जिन्दा समंदर में सफीने में



न सर पे आशियाँ जिनके न खाने को निवाले हैं

उन्हें क्या फर्क पड़ता है यूँ मरने और जीने में



हुये मशहूर किस्से जब अदाए कातिलाना के

सहेजूँ किस तरह तुमको अँगूठी के नगीने… Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 18, 2017 at 8:05pm — 12 Comments

ग़ज़ल....रूप लम्हों में बदलती ज़िन्दगी का क्या करूँ

2122 2122 2122 212

रूप लम्हों में बदलती ज़िन्दगी का क्या करूँ

हौसलों का क्या करूँ चीने जबीं का क्या करूँ



रंग लाती ही नहीं अश्कों दफ़न की कोशिशें

आँख में आती नज़र रंजो ग़मी का क्या करूँ



​​रो रही है रात गुमसुम चाँद तारे मौन है

आग अंतस में लगाये चाँदनी का क्या करूँ



ओढ़ चादर कोहरे की कपकपाते होंसले

हर कदम पे थरथराते आदमी का क्या करूँ



हों इरादे आसमां तो जुगनुओं से रोशनी

आप घर खुद ही जलाये रोशनी का क्या करूँ



गुनगुनायें… Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 14, 2017 at 11:52am — 18 Comments

हिन्दी ग़ज़ल...जब सूर्य चले अस्ताचल को

22 22 22 22
जब सूर्य चले अस्ताचल को
गहराय तिमिर घेरे तल को

इक दीप जलाओ अंतस में
जगमग कर दो भूमण्डल को

आवाज बनो तुम गूंगों की
तूफान बना दो हलचल को

जब चलना है, तो साथ चलें
पग से नापें नभ जल थल को

दुःख दुनिया का पी लेंगें 'ब्रज'
रक्खो तैयार हलाहल को
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 9, 2017 at 7:00pm — 17 Comments

ग़ज़ल...कई शम्स उसने सँभाले हुये हैं

122 122 122 122
कई शम्स उसने सँभाले हुये हैं
वो जिसके करम से उजाले हुये हैं

चला जो सदा सत्य की लौ जलाये
उसी शख्स के पांव छाले हुये हैं

ये जिनकी तपिश से जले आशियाने
वो मुददे नहीं बस उछाले हुये हैं

कहीं दूध मेवा कहीं आदमी को
बमुश्किल मयस्सर निवाले हुये हैं

विसाले सनम के हसीं ख्वाब दिल से
कई साल पहले निकाले हुये हैं
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 4, 2017 at 6:38pm — 14 Comments

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