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Manan Kumar singh's Blog – June 2016 Archive (7)

गजल(आ गये फिर ...)

2122 22 2

आ गये फिर गिरगिट जी
शुरू हुई अब गिट-पिट जी।1

रंग बदले कितने सब
हो गये हैं अब हिट जी।2

माप कोई जूते की
पाँव इनके हैं फिट जी।3

ढ़ाल लिया सबको शीशे
इस कला के डी.लिट. जी।4

राह इनकी रूकती कब
पास पड़े सब परमिट जी।5

रोशनी के ठेके हैं
बन गये हैं सर्किट जी।6

पास होते हरदम ही
काम आती बस चिट जी।7
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on June 30, 2016 at 7:10am — 2 Comments

गजल (महफिल सजा हम आज ...)

महफिल सजा हम आज तक बैठे हुए

महबूब तो हैं बेवजह उखड़े हुए।1



अपनी वफा पे ढ़ा गये जुल्मो सितम

मुड़कर जरा देखा नहीं चलते हुए।2



आसान उनकी राह हमसे हो गयी

मुश्किल हुई अपनी चले गाते हुए।3



मौसम गया है लोढकर सारा शुकूं

बेकस हुए पादप तने बिखरे हुए।4



कसमस कथाएँ झेलती कलिका रही

बनठन चले हैं आज वे निखरे हुए।5



बहतीं कहाँ खुलकर हवाएँ अब यहाँ

हँसते हुए तारे अभी सहमे हुए।6



रूकता कहाँ बेखौफ कातिल मनचला

अंदाज…

Continue

Added by Manan Kumar singh on June 27, 2016 at 11:00pm — 6 Comments

गजल(आजकल मन लग रहा.....)

आजकल मन लग रहा नक्कारखाना हो गया

कुर्सियों के खेल में सच भी फसाना हो गया।1



योग का मतलब अभी तक जोड़ना समझा गया

सोच की बलिहारियाँ अब तो घटाना हो गया।2



कर रहा परहेज जिससे चल रहा था बावरा

गर्ज एेसी पड़ गयी फिर गर लगाना हो गया।3



घूँघटों की ओट से ही चल रहे थे तीर सब

बह गयी ऐसी हवा मुखड़ा दिखाना हो गया।4



शब्द साधे थे कभी जिनको निशाना कर यहाँ

आज उनके पाँव में कैसे सिढ़ाना हो गया।5



तुम नशे में चल रहे हो, मैं नशा करता… Continue

Added by Manan Kumar singh on June 23, 2016 at 12:08pm — 10 Comments

गजल(दीप बन जलता रहा हूँ.....)

दीप बन जलता रहा हूँ रात-दिन
रोशनी बिखरा रहा हूँ रात-दिन।1

जब अचल मन का पिघलता है कभी
नेह बन झरता रहा हूँ रात-दिन।2

फिर उबलता है समद निज आग से
मेह बन पड़ता रहा हूँ रात-दिन।3

कामनाएँ जब कुपित होकर चलीं
देह बन ढ़हता रहा हूँ रात-दिन।4

व्योम तक विस्तार का कैसा सपन!
मैं 'मनन' करता रहा हूँ रात-दिन।5
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on June 20, 2016 at 11:00am — 14 Comments

गजल(धूप का मंजर बला था)

2122 2122



धूप का मंजर बला था

साथ पर साया चला था।1



आज जितना तब कहाँ यह

छाँव का आलम खला था।2



सच कहा है घर हमेशा

खुद चिरागों से जला था।3



क्यूँ मिटाने पर तुले अब

बच गया जो अधजला था।4



बातियों का नेह बहकर

हो गया तब जलजला था!5



स्वेद सिंचित हो गयी भू

पेड़ तब कोई पला था।6



रंग सबके मिल गये थे

इक तिरंगा तब फला था।7



रश्मियों के प्रेम-रस पग

जड़ हिमालय भी गला था।8



कट रहे हम… Continue

Added by Manan Kumar singh on June 16, 2016 at 11:00pm — 6 Comments

गीतिका (आनंदवर्धक छंद)

2122 2122 212

दो कदम आगे बढ़ा कर देखिये

अब जरा नजदीक आकर देखिये।1



जो सुलगती है रही तबसे यहाँ

आग वह फिर से जला कर देखिये।2



सोलहों आने खरा अपना कनक

जो लगे अब भी तपा कर देखिये।3



खनखनाता मैं रहा कितना कहूँ

अब नहीं फिर से बजा कर देखिये।4



देख लेंगे लोग बस डरते रहे

जी करे नजरें बचा कर देखिये।5



चल चुके अबतक बहुत जाने-जिगर

पग कभी मुझसे मिला कर देखिये।6



हो रहे हैं बेखबर फिर बेवजह

फासले कुछ तो मिटाकर… Continue

Added by Manan Kumar singh on June 14, 2016 at 7:03am — 11 Comments

गजल(आग जंगल में लगी.....)

2122 2122 212



आग जंगल में लगी बुझती कहाँ

तीलियों-सी रौ समंदर की कहाँ।1



रस धरा का पी रहे बरगद खड़े

लग रहा है जिंदगी यूँ जी कहाँ।2



लाज ढ़कने का उठा बीड़ा लिया

तार होता है वसन जो सी कहाँ।3



अब लजाने का जमाना लद गया

यह नयन बहता जुबानी भी कहाँ।4



साथ चलने का भरा था दम कभी

दिख रहा मझधार में वह ही कहाँ।5



आँसुओं में घुल गये कितने शिखर

है पिघलता आज भी यह जी कहाँ।6



सुन रहा कब से जमाने की सदा

कह… Continue

Added by Manan Kumar singh on June 5, 2016 at 4:00pm — 6 Comments

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