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Pushyamitra Upadhyay's Blog – November 2012 Archive (7)

चाँद को भी हम कब तलक देखें

चाँद को भी हम कब तलक देखें
न देखें तुम्हे तो क्या फलक देखें

खुद चला आया जो आफताब आँखों में
फिर क्या किसी शम्मा की झलक देखें

आने का यकीं दे चले थे मुस्कुरा के वो
कुछ और हम ये तनहा सड़क देखें

वो न देखें मेरे ये लडखडाये से कदम
देखना है तो मेरी आँखों में चमक देखें

क्या देखते हैं आप यूं काफियों को घूर कर
मिल जाए जो जहां बस सबक देखें

-पुष्यमित्र उपाध्याय



Added by Pushyamitra Upadhyay on November 26, 2012 at 10:36pm — 7 Comments

ना जाने कितने कसाब?

आखिरकार कसाब मारा गया! एक लम्बा चला आ रहा विरोध और इंतज़ार ख़त्म हुआ! इस मृत्यु से उन सभी शहीदों जिन्होंने कि देशरक्षा के लिए अपने प्राण निस्वार्थ अर्पण कर दिए के परिजनों को मानसिक शांति तो मिली होगी किन्तु उन्होंने जो खोया उसकी भरपाई नहीं हो सकती|

  कसाब को मारना सिर्फ एक कदम था निष्क्रियता से उबरने के लिए, हालांकि ये बहुत जरुरी भी था| मगर सवाल ये उठता है कि क्या कसाब को मार देना ही उन शहीदों के लिए श्रृद्धांजलि होगी? क्या कसाब ही अंतिम समस्या थी? शायद नहीं! कसाब उस समस्या का सौंवा हिस्सा…

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Added by Pushyamitra Upadhyay on November 26, 2012 at 4:49pm — 1 Comment

क्या देखें

वो नज़र नज़र भर क्या देखें
वो रुका समंदर क्या देखें

जो पत्थर जैसा मिला सदा
दिल उसके अन्दर क्या देखें

कोई उनके जैसा बना नहीं
हम तुम्हें पलटकर क्या देखें

हमने तो हंस के छोड़ा सोना
ये कौड़ी चिल्लर क्या देखें

वो चाँद बुझा कर जा सोये
हम तारे गिनकर क्या देखें

टूट गये गुल गईं बहारें
अब उजड़ा मंज़र क्या देखें

-पुष्यमित्र उपाध्याय

Added by Pushyamitra Upadhyay on November 21, 2012 at 10:09pm — 3 Comments

कुछ और ...

कुछ और शाम इंतज़ार सही
कुछ और दिल बेकरार सही

कुछ और रखी जिन्दगी दांव पे
कुछ और तेरा ऐतबार सही

कुछ और गम के समंदर पालूँ
कुछ और काज़ल की धार सही

कुछ और चले ये रात अँधेरी
कुछ और सर्द अंगार सही

कुछ और चाँद की ख्वाहिश मेरी
कुछ और तेरा ये प्यार सही

-पुष्यमित्र उपाध्याय

Added by Pushyamitra Upadhyay on November 20, 2012 at 8:56pm — 3 Comments

ज़िन्दा हूँ

फूल ही सही मगर ख़ारों में ज़िन्दा हूँ
मय बनकर ही तलबदारों में ज़िंदा हूँ

मैं इश्क हूँ मुझे आशारों में न ढूंढ
मैं तेरी आँख के इशारों में ज़िन्दा हूँ

मुझे आसमाँ की आज़ादी मिली न कहीं
मैं तेरी याद के इज्तिरारों में ज़िन्दा हूँ

न दे गवाही मुझे इनकारों की तमाम
मैं तेरे खामोश इकरारों में ज़िंदा हूँ

ये माना कि किश्ती है जलजलों में अभी
मैं मगर उम्मीद के किनारों में ज़िन्दा हूँ

-पुष्यमित्र उपाध्याय

Added by Pushyamitra Upadhyay on November 19, 2012 at 9:35pm — No Comments

श्री डेंगू जी : "एक अमर गाथा"

यूं तो हमारे देश में कई क्रांतिकारी कई देशभक्त आये| कोई नोटों तक पहुंचा कोई गुमनामी में खो गया, किसी को चर्चे मिले कोई किताबों में सो गया| मगर उन्होंने अपना कर्तव्य कभी नहीं छोड़ा, आजादी के बाद भी अनेक क्रांतिकारी यदा-कदा देश में आते-जाते रहे| जब-जब शासन अपनी शक्तियों और कर्तव्य को भुला कर कुछ भी करने में अक्षम रहा, वे देशभक्त उन्हें कर्तव्य बोध कराते रहे|

   ऐसा ही कर्तव्य बोध हाल ही में हमारे देश के एक वीर क्रांतिकारी द्वारा सरकार को कराया गया| ये वीर कोई और नही बल्कि परम साहसी, अत्यंत…

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Added by Pushyamitra Upadhyay on November 9, 2012 at 4:10pm — 7 Comments

कैसे धर लूं धीर पिया मैं इन आँखों की प्याली में

रो रोकर हार गया काजल

हार गये बिछुए कंगना

समझा दो तुम ही तुम बिन

अब कैसे जिएगा ये अंगना

कैसे आयें प्राण कहो अब नथ,बिंदियाँ और लाली में

कैसे धर लूं धीर पिया मैं इन आँखों की प्याली में



सब देखें छत चढ़ चढ़ चन्दा,

पर मेरा चन्दा रूठ गया

दिल का बसने वाला था जो

कितना पीछे छूट गया

कैसे रंग रहे होली में कैसी चमक दिवाली में

कैसे धर लूं धीर पिया मैं इन आँखों की प्याली में



जनम जनम की कसमें सारी

इक क्षण में ही तोड़ चले

तुम क्या जानो अंखियों से…

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Added by Pushyamitra Upadhyay on November 4, 2012 at 9:44pm — 5 Comments

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