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डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव's Blog – November 2015 Archive (3)

हाँ, तुम बंट गए उस दिन कबीर

हाँ, तुम बंट गए उस दिन कबीर

 

अहो कबीर !

कही पढा था या सुना

तम्हारी मृत्यु पर

लडे थे हिन्दू और मुसलमान 

जिनको तुमने

जिन्दगी भर लगाई फटकार

वे तुम्हारी मृत्यु पर भी

नहीं आये बाज

और एक

तुम्हारी मृत देह को जलाने   

तथा दूसरा दफनाने  

की जिद करता रहा

और तुम

कफ़न के आवरण में बिद्ध

जार-जार रोते इस  मानव प्रवृत्ति पर 

अंततः हारकर मरने के बाद…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 28, 2015 at 6:00pm — 24 Comments

चिता कब बनोगी ?

 पौरुष ने उठाया हाथ

सहनशीलता  ने

कर तो लिया बर्दाश्त

पर चेहरा विकृत हुआ

अधर काँपे

आँखे पनिआयी 

झट वह चौके में चली गयी

बेटी दौड़ी-दौड़ी आयी

क्या हुआ माँ ?

कैसी आवाज आयी ?

और यह क्या तू रोती है ?

नहीं बेटी, ये लकड़ियाँ ज़रा गीली है

धुंआ बहुत देती है

आँख में गडता है, पानी निकलता है

बेटी ने कहा – ‘ माँ !

गीली लकड़ी का

तुमसे क्या सम्बन्ध है ?

माँ ने कहा ‘ हम दोनों

जलती…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 12, 2015 at 4:30pm — 11 Comments

आवेश

सहसा

छा जाता है आवेश

कुछ लगता है सनसनाने

मस्तिष्क में होने लगता है

घमासान 

हाथ हठात पहुँचते है

लेखनी पर

इतना भी नहीं होता

कि तलाश लें

कोई कायदे का कागज

नोच लेता है हाथ

किसी अखबार का टुकड़ा

या किसी रद्दी का खाली भाग 

और दौड़ने लगते है उस पर

अक्षर निर्बाध 

अवचेतन सा मन

मानो कोई उड़ेल देता है

उसमें भावों की सम्पदा  

जो स्वस्थ चित्त में

चाह कर भी नहीं उभरता…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 4, 2015 at 8:44pm — 5 Comments

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