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SANDEEP KUMAR PATEL's Blog – December 2013 Archive (6)

चिर निद्रा से जाग युवा कब तक सोएगा

चिर निद्रा से जाग युवा कब तक सोएगा



देख हताशा की मिट्टी मन में लिपटी है

स्वार्थ सिद्धि में लिप्त भावना भी सिमटी है

ले आओ तूफान के मिट्टी ये उड़ जाए

मन का दिव्य प्रकाश देख तम भी घबराए



कब तक अनुमानों के दुनिया मे खोएगा

चिर निद्रा से जाग युवा कब तक सोएगा





स्वाभिमान खो गया तुम्हारा क्यूँ ये बोलो

तनमन से नंगे होकर तुम जग भर डोलो  

संस्कार मर्यादाओं का भान नहीं है

यकीं मुझे आया के तू इंसान नहीं है

   

जन्म…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on December 15, 2013 at 8:45pm — 4 Comments

हूँ प्यासा इक महीने से /ग़ज़ल/ संदीप पटेल "दीप"

हजज मुरब्बा सालिम

१२२२/१२२२

हूँ प्यासा इक महीने से

मुझे रोको न पीने से



पिला साकी  सदा आई

शराबी के दफीने से  



पिला बेहोश होने तक

हटे कुछ बोझ सीने से 



न लाना होश में यारो

नहीं अब रब्त जीने से 

 

उतर जाने दो रग रग में 

उड़े खुशबू पसीने से

जिसे हो डूबने का डर 

रखे दूरी सफीने से



हुनर आता है जीने का

है क्या लेना करीने से  



गिरा न अश्क उल्फत में

ये…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on December 15, 2013 at 11:30am — 14 Comments

पहले थे हम इक हकीकत अब कहानी हो गए/ ग़ज़ल

पहले थे हम इक हकीकत अब कहानी हो गए

जब से अपने ख्वाब यारो आसमानी हो गए

 

पांच सालों में महल सा अपने घर को कर लिया

चोर डाकू करके मेहनत खानदानी हो गए

 

तुम जियो खुश जिन्दगी भर ऐसा उसने जब कहा

एक सिक्का था उछाला हम भी दानी हो गए

 

यूँ हमारी हर ग़ज़ल खुशबू हुई औ सर चढ़ी 

देखते देखते हम जाफरानी हो गए

 

“दीप” गम के पर्वतों को तुमने क्या पिघला दिया  

गर्दिशों की कौम के सब पानी पानी हो गए

 

संदीप…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on December 6, 2013 at 2:00pm — 21 Comments

वर्तमान पर कविता / संदीप पटेल /अतुकांत

आँखों से बहता लहू

लाल लाल धधकती ज्वालायें

कृष्ण केशों सी काली लालसाएँ

ह्रदय की कुंठा

असहनीय वेदना

दर्दनाक कान के परदे फाड़ती

चीखें

लपलपाती तृष्णा

तिलमिलाती भूख

अपाहिज प्रयास

इच्छाओं के ज्वार भाटे

आश्वासन की आकाशगंगा

विश्वासघाती उल्कापिंड

हवस से भरे भँवरे

शंकाओं से ग्रसित पुष्प

उपेक्षाओं के शिकार कांटे

हाहाकार चीत्कार ठहाके

विदीर्ण तन

लतपथ , लहूलुहान…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on December 5, 2013 at 11:23am — 14 Comments

इसलिए तो आज भी बर्बाद हैं हम / ग़ज़ल "संदीप पटेल "दीप"

रस्म वाले देश की औलाद हैं हम
आज के बच्चे कहें सैयाद हैं हम

उनकी बीबी मायके जब से गयी है  
कहते फिरते आजकल आज़ाद हैं हम

ढँक गए हैं गर्द से तो भूलिए मत
इस महल की रीढ़ हैं बुनियाद हैं हम

छोड़ के वो हाथ मेरा जो चले थे
गमजदा हैं देख ये आबाद हैं हम

"दीप" हरदम की मदद है दूसरों की
इसलिए तो आज भी बर्बाद हैं हम

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on December 1, 2013 at 10:00pm — 12 Comments

अन्धकार

मौन हवाएं

सर्द गर्म और सीली सीली

आते जाते

आम जनों की

तबियत ढीली  

सन्नाटों की चीख

अनवरत अनुशासित है

लेन देन की बात करे हैं

सारे उल्लू

चन्दा का उजियारा

ढूँढे

जल भर चुल्लू

भूतों और पिशाचों से

बस ये शासित है

दहशत वहशत

खुली सड़क पर

खुल के झूमें

डाकू और लुटेरे

क्षण क्षण

दामन चूमें

शबनम का कतरा

त्रण त्रण में आभासित…

Continue

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on December 1, 2013 at 8:00pm — 13 Comments

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