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गज़ल - ग़म किसी का किसी की राहत है - गिरिराज भंडारी

2122  1212   22  /112

क्या नहीं ये अजीब हसरत है ?

ग़म किसी का किसी की राहत है

 

ख़ाक में हम मिलाना चाहें जिसे

उनको ही सारी बादशाहत है

 

रोटी कपड़ा मकान में फँसकर

बुजदिली, हो चुकी शराफत है

 

हर्फ करते हैं प्यार की बातें

आँखें कहतीं हैं, तुमसे नफरत है

 

मुज़रिमों को मिले कई इनआम

आज मजलूम की ये क़िस्मत है

 

बेरहम क़ातिलों को मौत मिली

सेक्युलर कह रहे , शहादत है

 

हाँ,…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on December 24, 2015 at 10:30am — 30 Comments

नस्री नज़्म :- "तीसरा विश्व युद्ध"

आत्म ग्लानी से

मेरी गर्दन झुक जाती है

जब मैं यह देखता हूँ

कि इंसान ,तरक़्क़ी करते करते

इन हदों पर पहुँच चुका है

कि उसने,

पिशाच का रूप ले लिया है,

आज हम तीसरे विश्व युद्ध के

दहाने पर खड़े हैं,

इसी पिशाचता के कारण,

ताक़त की भूक

बहुत बढ़ गई है,

अब सिर्फ़,एक चिंगारी की आवश्यकता है,

और युद्ध शुरू,

परिणाम ?

तबाही ,बर्बादी

नरसंहार ,ख़ून के दरिया

लाशों के अंबार

भूक,लाचारी,

इंसानी जान की कोई क़ीमत नहीं,

सब… Continue

Added by Samar kabeer on December 2, 2015 at 4:08pm — 14 Comments

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