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Manan Kumar singh's Blog – October 2015 Archive (3)

गजल/गीतिका

गीतिका

आधार छंद-मनोरम

मापनी 2122 2122

समांत-आत

पदांत-आओ

आ सुनो इक बात,आओ।

गुम हुई इक रात,आओ।

ढूँढता मैं आज तक हूँ,

यादों' की बारात,आओ।

सज गयी वह सेज कैसी!

तब के' सुन हालात,आओ।

वात ने दीपक बुझाया,

फिर हुई बरसात,आओ।

ओट घूँघट की रही थी,

काँपता तब गात,आओ।

चूमती फिर बूँद निर्भय,

मौन झंझावात,आओ।

झटके' में तब ओट छँटती,

झाँकता जलजात,आओ।

रे तुहिन कण से नहाया,

हो गया तन-पात,आओ।

गड़ रहा वह रूप… Continue

Added by Manan Kumar singh on October 21, 2015 at 10:00pm — 2 Comments

गजल(मनन)

गजल

2212 2212 2212

कुछ कुछ उठा कर कब्र से लाया गया

बिसरा हुआ संगीत सुनवाया गया ।

मतदान की होते यहाँ पर घोषणा

फिर कुंद वह हथियार चमकाया गया।

देते रहे गाली परस्पर थे बहुत

मिलकर गले उनके लिपट जाया गया।

देते रहे थे घाव अबतक तो वही

फिर से सभी जख्मों को' धुलवाया गया।

कितने अपावन हो गये जो साथ थे

जो था अपावन नेह नहलाया गया।

हम-तुम हमेशा साथ थे आगे रहें

ऐसा अभी फरमान चिपकाया गया।

घर-घर लगायी आग सब सोये रहे

संपर्क कर फिर वर्ग… Continue

Added by Manan Kumar singh on October 6, 2015 at 11:09pm — 3 Comments

गजल

गजल

2122 2122 2122 212

आपका ऐसे यहाँ आना ठिकाना हो कभी

खिल उठे बगिया मिलन का तो बहाना हो कभी।

धूप का धोया पथिक मैं जल रहा हूँ कामिनी

रूप के जी नेह जल से अब नहाना हो कभी।

लय भरे थे दिन कभी फिर लय भरी थी यामिनी

लौट आयें दिन वही फिर से तराना हो कभी।

भाव मन का भाँप लेतेे बिन कहे बातें हुईं

आ चलें फिर आजमा लें क्यूँ बताना हो कभी?

वक्त ने कितना सताया याद रखना लाजिमी

छक चुके अबतक बहुत अब क्यूँ छकाना हो कभी?

कह रहा हर पल कथाएँ आज अपने प्यार… Continue

Added by Manan Kumar singh on October 2, 2015 at 6:00pm — 4 Comments

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