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दिलीप कुमार तिवारी's Blog (10)

आज़ादी की तलाश

आज़ादी के कई सालों बाद

उसकी तलाश ज़रूरी लगती है .

प्रजातन्त्र की भौतिकवादी

प्रवित्रियो में लिप्त आज़ादी  अधूरी लगती है.

आज़ादी की तलाश  उन बcचो के सपनों में है

जिनका बचपन कलम-किताब छोड़  होटलों में बिकता है

आज़ादी की तलाश  किसानों के खेतों में है

जिनके आखों में पानी  और गले मे मौत है

आज़ादी की तलाश  वेरोज़गार युवीमन में है

जहाँ आखरी डिग्री की आस है

जिससे भूखा पेट भरा जा सके

आज़ादी की तलाश  फूटपाथ पर सोए लोगों…

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Added by दिलीप कुमार तिवारी on August 14, 2015 at 1:30am — 4 Comments

दिल्ली

एक शहर

अत्यधिक आधुनिक टापुओ का है

जहाँ गरीवी बहुत बौनी दिखती है

हर गली में अमीरी गुलजार है

वहाँ गरीवो से अप्रत्यासित घ्रणा

अमीरों के अमीरी से बेशुमार प्यार है

वह "ग़ालिब "का शहर प्रेम से कितनी दूर हो गया है

हैवानियत ,दरिन्गीं ,लफ्फाजियो  के लिए मशहूर हो गया है

इस शहर में रहते है भारत के कर्णधार

जिनका प्रिय पेशा है भ्रस्टाचार

ओ किसी भी काम में अपने को शिद्ध पुरुष मानते है

तोप ,प्याज ,अनाज से लेकर चारा तक खाने में माहिर है …

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Added by दिलीप कुमार तिवारी on October 8, 2013 at 11:30pm — 13 Comments

संवेदना

संवेदन शील मन

बार-बार क्यों

डूबता उतराता है

संवेदना के समंदर में

हजारबार गोते खाता है

प्रश्नों का अम्बार है

आज तो मर्यादा का व्यापार है

वास्तव में संवेदनाहीन हो रहा संसार है

गरीवी ,लाचारी ,बेचारी ,बेरोजगारी और कुछ शब्द थे ,

जिनमें संवेदना का अधिकार व्याप्त था

संवेदनशील मन के लिए इन शब्दों का होना पर्याप्त था

किन्तु संवेदना की परिभाषा बदल गयी

जहाँ संवेदना थी ओ भाषा बदल गयी

आज अत्याचारी ,बलात्कारी, भ्रष्टाचारियों पर…

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Added by दिलीप कुमार तिवारी on October 7, 2013 at 12:30am — 15 Comments

मै आदमी हूँ / दिलीप कुमार तिवारी

 मै आदमी हूँ

सम्बेदंशील हूँ

मुझे  कई आदमी

कहलाए जाने वालों

ने   छला है I



छाछ फूककर  

पीता हूँ हर-बार

क्यों की मेरा मुह

दिखावे के गर्म दूध से जला है I I



कल्पनाओ का समंदर

मेरे मन में भी है

कुछ पाने की चाह में

जीवन की राह  में  तुमसे मिला है I I I



मुझे रोकना नहीं

टोकना नहीं तुम

बढने दो मेरे पैर

ये हमारी दुश्मनी बदल कर

दोस्ती का सिलशिला है I I I I



मौलिक /अप्रकाशित

दिलीप कुमार तिवारी…

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Added by दिलीप कुमार तिवारी on September 11, 2013 at 12:59am — 12 Comments

"मजदूर "

तपती वसुन्धरा  में 
श्रम सक्ती के समन्वय रूपी खाद में
निर्माणों के

विशालकाय पेंड़ो को रोपता है
अपने कंधो के सहारे ढोता है

गरीवी का बोझ
जिसमे उसका स्वाभिमान

दबा हैं , कुचला है
मन अनंत गहराईयों में

डूबता उतराता चुप है
शांति समर्पण की अदभुत मिशाल "मजदूर "
वर्तमान भारत में खो गया है
निर्माणों के अंधे युग में  आज
निर्माण से ही दूर हो गया है


मौलिक /अप्रकाशित
दिलीप तिवारी  रचना -८ /९/१ ३

Added by दिलीप कुमार तिवारी on September 8, 2013 at 1:30am — 11 Comments

मेरा मन

मन का "सुदामा होना"लाज़मी था 

तेरी आखो के कृष्ण का इतना असर हो गया

क्या होती है गरीवी

सब कुछ खो जाने के बाद समझा

नही ,आमीर आदमी था

ये मिलन का इंतजार "द्रोपदी का चीर" हो गया

"भगीरथ प्रयत्न" कर-कर

मन आज अधीर हो गया

फिर भी "अग्नि परीक्षा" मेरी अधूरी है

आज भी मेरी-तेरी दूरी है

 अंतर ह्रदय  "दूर्वासा"है

क्रोध के ताप मे भी मिलने की आशा है

जानता है मन मिल कर तुमसे कुबेर हो जाएगा

संताप के ताप से फिर दूर हो जाएगा …



Continue

Added by दिलीप कुमार तिवारी on September 8, 2013 at 1:00am — 8 Comments

गज़ल / दिलीप तिवारी

ग़मों के घाव अभी भरे नही i
दवा में लगता मिला ज़हर है i i

बेनाम बस्ती में लोग रहते है  i
उन्ही बस्तियों से बना शहर है  i i

आदमी -आदमी को नहीं जाना  i
ज़िन्दगी सात दिनों का सफ़र है  i i

नदियाँ  भी डरती है भरने से  i
उनसे लगी बड़ी सूखी नहर है  i i

खामोश आज सभी हवायें है  i
वक़्त का उनपर भी असर है  i i

मै  भूला अपना रास्ता आज  i
पता नहीं जाना मुझे किधर है  i i

मौलिक /अप्रकाशित

दिलीप कुमार तिवारी

Added by दिलीप कुमार तिवारी on July 16, 2013 at 10:37pm — 7 Comments

सरस्वती आराधना /दिलीप तिवारी

वीणाधारी  विद्यावाली , मातु शारदे तुम्हे नमन i 

शव्द अर्थ के पुष्पों का ,व्याकरण बना तुमको अर्पण i i 

संज्ञाए सेवाये करती ,सर्वनाम तेरे अनुचर i

क्रिया विशेषण की तारों से ,निकले वीणा के स्वर i i

नवरस के घुगरू प्यारे अलंकार  की है झांझर i

काव्य गद्य श्रगारित तुमसे ,गीतवना  महिमा गाकर i i

अनुपम छटा सवाँरे  ,भाषाए है चरणो पर i

आलोडित मन मंदिर मेरा नेह सुधा तेरी पाकर i i

मुझको तेरा वरदान मिले ,चरणों में तेरे स्थान मिले i 

शीख रहा माँ कविता  करना ,अंतर मन…

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Added by दिलीप कुमार तिवारी on July 15, 2013 at 8:22pm — 5 Comments

आनंद / दिलीप कुमार तिवारी

आनंद जीवन है , शब्द मात्र नहीं

संसार के बियाबान  सुनसान  अधेरी राहों  में,

रोशनी की तरह इसकी तलाश  है

हम तुम यह जग जबसे है आनंद आस -पास है



ये उजड़ी गलियों में भी था ,थकी हुई सडको में भी है , तुम्हारे पगडण्डी में भी है i

बस इसे पाने का विश्वाश खो गया है ,हमारा अपनापन इससे कितनी दूर हो गया है i



कही हम इसे  बदनाम बस्तियों में ढूढ़ते है 

कही हम अपने से बड़ी हस्तियों में ढूढ़ते है

अल्पकालीन किन्तु सर्वव्याप्त है  

जितना मिला क्या…

Continue

Added by दिलीप कुमार तिवारी on July 14, 2013 at 7:30pm — 3 Comments

तलाश

अंतर मन में

अनंत  इच्छाएँ

बिल्कुल समन्दर

की लहरों की तरह

ठीक कुछ समय बाद

समाप्त हो जाती है

ऐसा लगता है कि

कितनी अपेक्षा से

प्रकृति ने जिन भावों

को जगाया था मन में

उन भावों को सपनो में

सजोकर बंदकर

अलसाई उनीदी आखे

फिर सोजाती है

तलाश है उस नीद की

जो  संतुष्टि के बाद

खुले आसमान के नीचे

बैभव से दूर बसुधा की माटी में

माँ के आँचल की तरह सुलाती है

सहलाती…
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Added by दिलीप कुमार तिवारी on July 7, 2013 at 8:00pm — 4 Comments

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