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ग़़ज़़ल- फोकट में एक रोज की छुट्टी चली गई

बह्र - मफऊल फाइलात मफाईल फाइलुन
221 2121 1221 212

अन्धों के गांव में भी कई बार ख्वामखाह
करती है रोज रोज वो ऋंगार ख्वामखाह

रिश्ता नहीं है कोई भी उससे तो दूर तक
मुजरिम का बन गया है तरफदार ख्वामखाह

फोकट में एक रोज की छुट्टी चली गई
इतवार को ही पड़ गया त्यौहार ख्वामखाह

नाटक में चाहते थे मिले राम ही का रोल
रावण का मत्थे मढ़ गया किरदार ख्वामखाह

ये बुद्ध की कबीर की चिश्ती की है जमीन
फिर आप भाँजते हैं क्यूँ तलवार ख्वामखाह

खबरे बढ़ा चढ़ा के दिखाना है इनका काम
तिल का बना दें ताड़ ये अखबार ख्वामखाह

खारों से मेरी कोई अदावत न थी मगर
पैरों मे चुभ गये हैं मेरे खार ख्वामखाह

मौलिक अप्रकाशित अप्रसारित

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Comment by Ram Awadh VIshwakarma on May 29, 2020 at 7:32pm

आदरणीय तेजवीर सिंह जी ग़ज़ल सराहना एवं उत्साह वर्धन के लिये सादर आभार

Comment by TEJ VEER SINGH on May 29, 2020 at 5:59pm

हार्दिक बधाई आदरणीय  राम अवध विश्वकर्मा जी।बेहतरीन गज़ल।

खबरे बढ़ा चढ़ा के दिखाना है इनका काम
तिल का बना दें ताड़ ये अखबार ख्वामखाह

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on May 28, 2020 at 9:42am

आदरणीय लक्ष्मणधामी मुसाफिर जी सादर नमस्कार

ग़ज़ल सराहना एवं उत्साह वर्धन के लिए शुक्रिया

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 28, 2020 at 7:00am

आ. भाई राम अवध जी, सादर अभिवादन । अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on May 26, 2020 at 8:45pm

धन्यवाद आदरणीय समर कबीर साहब

Comment by Samar kabeer on May 26, 2020 at 8:40pm

सहीह शब्द "बेवज्ह"221 है,रदीफ़ "बेसबब" कर सकते हैं ।

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on May 26, 2020 at 8:10pm

धन्यवाद आदरणीय समर कबीर साहब जी मैं रदीफ को बदलकर बेवजह कर दूंगा।

Comment by Samar kabeer on May 26, 2020 at 6:38pm

//जनाब अमीरुद्दीन खान साहब के अनुसार खामखा रदीफ में ले सकते हैं?//

नहीं ले सकते,आपको रदीफ़ बदलना पड़ेगी ।

Comment by Samar kabeer on May 26, 2020 at 6:36pm

//जानना चाहता हूँ कि क्या लफ़्ज़ ख़ामख़ा लेना दुरुस्त है या नहीं अगर दुरुस्त है तो क्या लफ़्ज़ 'ख़ाह मख़ाह' में दोनों जगह मात्राएं गिराई जा सकती हैं//

'ख़ामख़ा' कोई शब्द ही नहीं है,और "ख़ाह मख़ाह" में 'ह' 

नहीं गिर सकता ।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on May 26, 2020 at 5:32pm

जनाब राम अवध विश्वकर्मा जी, जैसा कि उस्ताद मुहतरम ने बताया है कि "इस शब्द को 'ख़ाह मख़ाह' भी लिख सकते हैं,कुछ मिसरों के अंत में एक साकिन की छूट इस बह्र में सहीह है" , 'ख़ाह मख़ाह' का वज़्न 21121 है और आपकी बह्र में गुंजाईश है 212 की यानि 'ख़ाह'-पर 'ह' की छूट और 'मख़ाह' - पर 'ह' की छूट = ख़ामख़ा। मैं उस्ताद मुहतरम से जानना चाहता हूँ कि क्या लफ़्ज़ ख़ामख़ा लेना दुरुस्त है या नहीं अगर दुरुस्त है तो क्या लफ़्ज़ 'ख़ाह मख़ाह' में दोनों जगह मात्राएं गिराई जा सकती हैं। सादर। 

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