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2122 1122 1122 22

दिल सलामत भी नहीं और ये टूटा भी नहीं ।
दर्द बढ़ता ही गया ज़ख़्म कहीं था भी नहीं ।।

काश वो साथ किसी का तो निभाया होता ।
क्या भरोसा करें जो शख़्स किसी का भी नहीं ।।

क़त्ल का कैसा है अंदाज़ ये क़ातिल जाने ।
कोई दहशत भी नहीं है कोई चर्चा भी नहीं ।।

मैकदे में हैं तेरे रिंद तो ऐसे साक़ी ।
जाम पीते भी नही और कोई तौबा भी नहीं ।।

सोचते रह गए इज़हारे मुहब्बत होगा ।
काम आसां है मगर आपसे होता भी नहीं ।।

वो बदल जाएंगे इकदिन किसी मौसम की तरह।
इश्क से पहले कभी हमने ये सोचा भी नहीं ।।

रूठ कर जाने की फ़ितरत है पुरानी उसकी ।
मैंने रोका भी नहीं और वो रुकता भी नहीं ।।

कोशिशें कुछ तो ज़रा कीजिए अपनी साहब ।
मंज़िलें ख़ुद ही चली आएंगी ऐसा भी नहीं ।।

हिज्र के बाद भी दिल में रही इतनी सी ख़लिश ।
हाले दिल आपने मेरा कभी पूछा भी नहीं ।।

मौलिक अ प्रकाशित

--नवीन मणि त्रिपाठी

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Comment

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Comment by Dimple Sharma on June 13, 2020 at 3:29pm

आदरणीय रवि भसीन'शाहिद'जी नमस्ते , एक सवाल था जैसा की आपने इस बहर के विषय में बताया तीसरी छूट के अनुसार एक लघु अलग से ले सकते हैं तो मेरा सवाल है कि क्या ये हर मिसरे पर कर सकते हैं या पूरी ग़ज़ल के एक ही मिसरे पर ये छूट है ? कृप्या मार्गदर्शन करें।

Comment by Dimple Sharma on June 13, 2020 at 3:25pm

आदरणीय नवीन जी नमस्ते ,इस खुबसूरत ग़ज़ल पर बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 9, 2020 at 3:59pm

आ. भाई नवीन जी, सादर अभिवादन । अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on June 9, 2020 at 11:29am

जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब, 'फ़िराक़' साहिब की ज़मीन में ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है,बधाई स्वीकार करें ।

बाक़ी जनाब रवि भसीन जी बता ही चुके हैं ।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on June 8, 2020 at 4:23pm

आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद' साहिब, आदाब ।

बहूर के विषय में दी गई अद्भुत जानकारी के लिए आपका हार्दिक आभार। 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on June 8, 2020 at 4:20pm

आदरणीय सालिक गणवीर साहिब, आदाब।

बहूर के विषय में दी गई अद्भुत जानकारी के लिए आपका हार्दिक आभार। 

Comment by सालिक गणवीर on June 8, 2020 at 12:41pm

आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद'साहिब

सादर अभिवादन

शंका समाधान के लिए आपका हार्दिक आभार. सादर.

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on June 8, 2020 at 12:19pm

आदरणीय सालिक गणवीर साहिब, नमस्कार। जी, रदीफ़ "भी नहीं" दरअस्ल 112 के वज़न पर है। ये बह्रे रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़ (मक़तू'अ) है, ये मीर साहिब द्वारा इस्तेमाल की गई कुल 28 बुहूर में भी है, और दीवान-ए-ग़ालिब की कुल 19 बुहूर में भी शामिल है। इसमें तीन छूटें ली जा सकती हैं। एक तो पहले रुक्न को 2122 के स्थान पर 1122 ले सकते हैं:
न बँधे तिशनगी-ए शौक़ के मज़्मूँ 'ग़ालिब'
1122 / 1122 / 1122 / 22
गरचे दिल खोल के दरया को भी साहिल बाँधा
2122 / 1122 / 1122 / 22

दूसरी छूट ये है कि आख़िरी रुक्न को 22 के स्थान पर 112 ले सकते हैं:
रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो 'ग़ालिब'
2122 / 1122 / 1122 / 22
कहते हैं अगले ज़माने में कोई मीर भी था
2122 / 1122 / 1122 / 112

तीसरी छूट, जो और भी कई बुहूर में ली जाती है, ये है कि आख़िरी रुक्न में एक लघु अतिरिक्त ले सकते हैं:
मिह्रबाँ हो के बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्त
2122 / 1122 / 1122 / 22(1)
मैं गया वक़्त नहीं हूँ कि फिर आ भी न सकूँ
2122 / 1122 / 1122 / 112

ग़म-ए-हस्ती का 'असद' किससे हो जुज़-मर्ग इलाज
1122 / 1122 / 1122 / 112(1)
शम्अ' हर रंग में जलती है सहर होते तक
2122 / 1122 / 1122 / 22

Comment by सालिक गणवीर on June 8, 2020 at 7:27am

आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी साहिब

सादर अभिवादन

शानदार ग़ज़ल की प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाइयाँ स्वीकार करें. आदरणीय 'एक स्पष्टीकरण की उम्मीद है आपसे. ग़ज़ल की बह्र का आखिरी अरकान 22 है मगर रदीफ़ 'भी नहीं'याने 212,क्या इस बह्र में ऐसी छूट मिलती है?

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on June 7, 2020 at 11:22am

आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी साहिब, इस शानदार ग़ज़ल पर दाद और मुबारकबाद क़ुबूल करें। जनाब, पाँचवें शे'र के ऊला का आख़िरी लफ़्ज़ "होगा" होना चाहिए, क्योंकि "इज़हार" पुल्लिंग है:
सोचते रह गए इज़हार-ए-मुहब्बत होगा

आख़िरी शे'र के ऊला के लिए एक सुझाव देना चाहूँगा:
2122 1122 1122 22
वस्ल के बाद भी दिल में रही इतनी सी ख़लिश

आदरणीय, कुछ टंकण त्रुटियाँ दुरुस्त कर लीजिये:
1 ज़ख़्म
2 काश, शख़्स
4 साक़ी
5 आसाँ
6 जाएँगे, इक दिन, इश्क़
8 मंज़िलें, आएँगी

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