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ग़ज़ल ( जाना है एक दिन न मगर फिक्र कर अभी...)

(221 2121 1221 212)

जाना है एक दिन न मगर फिक्र कर अभी
हँस,खेल,मुस्कुरा तू क़ज़ा से न डर अभी

आयेंगे अच्छे दिन भी कभी तो हयात में
मर-मर के जी रहे हैं यहाँ क्यूँँ बशर अभी

हम वो नहीं हुज़ूर जो डर जाएँँ चोट से
हमने तो ओखली में दिया ख़ुद ही सर अभी

सच बोलने की उसको सज़ा मिल ही जाएगी 
उस पर गड़ी हुई है सभी की नज़र अभी

हँस लूँ या मुस्कुराऊँ , लगाऊँ मैं क़हक़हे
ग़लती से आ गई है ख़ुशी मेरे घर अभी

मंज़िल बुला रही है मुझे कब से दोस्तो
है मेरे  इंतिज़ार में सूनी डगर अभी

क्यों चहचहा रही हैंं परिंदों की टोलियाँ
सूरज है सर पे देख हुई दोपहर अभी

* मौलिक एवं अप्रकाशित.

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Comment by सालिक गणवीर on August 17, 2020 at 4:13pm

भाई dandpani nahak जी
सादर अभिवादन
ग़ज़ल पर आपकी आमद और सराहना के लिए हृदयतल से आभार व्यक्त करता हूँ. सादर एवं सप्रेम.

Comment by सालिक गणवीर on August 8, 2020 at 3:36pm

भाई ब्रजेश कुमार जी

सादर अभिवादन

ग़ज़ल पर आपकी हाजिरी और सराहना के लिए हृदयतल से आभार.

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 8, 2020 at 3:08pm

बड़ी ही खूबसूरत ग़ज़ल कही है आदरणीय सालिक जी...आदरणीय समर जी एवं रवि जी की विवेचना भी शानदार रही..

Comment by सालिक गणवीर on July 8, 2020 at 7:44am

आदरणीय अमीरूद्दीन 'अमीर' साहिब

आदाब

ग़ज़ल पर आपकी हाज़िरी और सराहना के लिए आपका तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ. ये  उस्ताद-ए-मुहतरम समर कबीर साहिब और आप जैसे गुणीजनों के मार्गदर्शन एवं स्नेह का ही परिणाम है कि मुझ जैसे अदने शाइर की रचना को फीचर ब्लॉग में स्थान मिला. इसके लिए मैं आप सब का एवं ओबीओ प्रबंधन का शुक्रगुजार हूँ. सादर.

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on July 7, 2020 at 12:11pm

जनाब सालिक गणवीर जी आदाब, शानदार ग़ज़ल हुई है दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ साथ ही ग़ज़ल को फीचर ब्लॉग में शामिल होने पर ख़ास मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए। सादर। 

Comment by सालिक गणवीर on July 7, 2020 at 6:47am

आदरणीय समर कबीर साहिब

आदाब.

टंकन त्रुटि का अंदाजा हो गया था उस्ताद-ए-मुहतरम, इसलिए रवि साहब द्वारा सुझाए गए मिसरे का इस्तेमाल कर लिया. बहुत शुक्रिया आपका. आपका दिन शुभ हो.

Comment by Samar kabeer on July 5, 2020 at 3:18pm

//जाना है एक दिन तो न कर फ़िक्र तू अभी//

मेरे सुझाए इस मिसरे में टंकण त्रुटि हो गई है,इसे यूँ पढ़ें:-

जाना है एक दिन तो न तू फ़िक्र कर अभी'

Comment by सालिक गणवीर on July 5, 2020 at 11:12am

प्रिय रुपम

आदाब

ग़ज़ल पर हाज़िरी और सराहना के लिए मश्कूर-ओ-ममनून हूँ. शुक्रिया बालक.

Comment by सालिक गणवीर on July 5, 2020 at 11:09am

आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद' साहिब

आदाब.

ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति एवं सराहना के लिए तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ. आपकआपकी इस्लाह का ही इंतिज़ार कर रहा था.आपके सुझाव पर अमल करने के बाद पुनः पोस्ट करता हूँ. सादर.

Comment by सालिक गणवीर on July 5, 2020 at 11:04am

आदरणीय समर कबीर साहिब

आदाब

ग़ज़ल पर आपकी हाज़िरी और सराहना के लिए हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ. आपकी क़ीमती इस्लाह पर अमल करने के बाद ,पुनः पोस्ट करता हूँ. सादर

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