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पूर्णता का जो है प्रतीक ,वह तो बस एक शून्य है 

शून्य है जीवन का सत्य ,शून्य ही सम्पूर्ण है 

जिस बिंदु से आरम्भ होता ,होता वहीं वह पूर्ण है 

आरम्भ जीवन का शून्य से और अंत भी बस शून्य है 

शून्य में जोड़ दो ,चाहे जितने शून्य तुम 

या निकालो शून्य में से चाहे जितने शून्य तुम 

शून्य फिर भी शून्य है ,इसलिए सम्पूर्ण है 

बिंदु से आरम्भ हो कर ,वृहदाकार होता है शून्य 

पूर्ण ब्रह्म स्वरूप है शून्य ,ज्ञानी भी यह मानते 

हम सब भी हैं जानते ,अंतरिक्ष का पर्याय शून्य 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

    वीणा

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Comment by Dr. Vijai Shanker on November 30, 2020 at 11:41am

शून्य में से शून्य निकाल लो फिर भी शून्य ही बचता है , पूर्ण में से पूर्ण निकालो फिर भी पूर्ण ही रहता है। गंभीर विषय है , कविता में उसे प्रस्तुत करने हेतु बधाई , सुश्री आदरणीय वीणा गुप्ता जी , सादर।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 30, 2020 at 2:47am

आदाब। गंभीर शैली में गंभीर बात। हार्दिक बधाई आदरणीया वीणा गुप्ता जी।

Comment by Veena Gupta on November 25, 2020 at 4:49am
बृजेश जी,एवंश्री कबीर जी आभार aapka
Comment by Samar kabeer on November 24, 2020 at 5:19pm

मुहतरमा वीना गुप्ता जी आदाब, सुंदर रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 22, 2020 at 12:32pm

शून्य की महिमा का अच्छा वर्णन किया है आदरणीया...

Comment by Veena Gupta on November 22, 2020 at 3:22am
Obo का logo ही मेरी इस कविता का प्रेरणा स्रोत है.

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