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बच्चे सरायों में नहीं

घरों में पलते हैं

व्यक्तित्व आया से नहीं 

माँओं से बनते हैं

कितनी जल्दी लोग

पाला बदल लेते हैं

आज गँठजोड़ किसी से

कल,किसी और से कर लेते हैं

क्या कहें वक्त के सफ़र को हम

जहाँ निजता की चाह होती है

एक ही घर के बन्द कमरों में

अब,मोबाइल से बात होती है

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Usha Awasthi on March 9, 2021 at 5:26pm

आ0 लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर ' जी,सादर प्रणाम।

बहुत धन्यवाद आपको।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 9, 2021 at 4:44pm

आ. ऊषा जी, सादर अभिवादन । अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Usha Awasthi on March 8, 2021 at 2:02am

श्रीमान कृश मिश्रा जी ,

हार्दिक आभार आपका

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 8, 2021 at 12:36am

बहुत सुंदर अतुकांत हेतु बधाई आ. ऊषा जी

Comment by Usha Awasthi on March 7, 2021 at 9:09pm

आ0 अमीरुद्दीन 'अमीर' साहेब, आदाब।

रचना पसंद आने हेतु हार्दिक धन्यवाद आपको

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on March 7, 2021 at 7:51pm

मुहतरमा ऊषा अवस्थी जी आदाब, वास्तविक कथन का सुन्दर चित्रण करती रचना हुई है।  बधाई स्वीकार करें।  सादर। 

Comment by Usha Awasthi on March 7, 2021 at 6:50pm

आ0 समर कबीर जी,आदाब।

रचना आपको अच्छी लगी, मेरा लिखना सार्थक हुआ।

हार्दिक आभार आपका

लिखना सार्थक हुआ।

Comment by Samar kabeer on March 7, 2021 at 3:10pm

मुहतरमा ऊषा अवस्थी जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

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