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1212, 1122, 1212, 22

1)वो ऐसे लोग जो दुनिया से तेरी ग़ाफ़िल हैं
मेरी नज़र में वही आज सबसे आक़िल हैं

2)ये उसके सामने इक़रार करना चाहता हूँ
रक़ीब सारे मेरी जान मुझसे क़ाबिल हैं

3) हमारे मुल्क में है मसअला यही इक बस
पढ़े लिखे भी बहुत से यहाँ के जाहिल हैं

4)हकीम बेबसी मँहगी दवा सियासतदाँ
यही हैं वो जो मेरी ज़िन्दगी के क़ातिल हैं

5)मैं जिनके वास्ते दुनिया से लड़ने निकला हूँ
वो दुश्मनो की सफ़ो में हैं और मुक़ाबिल हैं

6)"अनीस " क्या दें हम इल्ज़ाम इस ज़माने को
हम इस के साथ तबाही में अपनी शामिल हैं

मौलिक अप्रकाशित 

(अनीस अरमान )

Views: 810

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Comment by Md. Anis arman on July 23, 2021 at 7:57pm

जनाब लक्ष्मण धामी साहब ग़ज़ल तक आने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया 

Comment by Md. Anis arman on July 23, 2021 at 7:56pm

जनाब समर कबीर साहब ग़ज़ल तक आने और अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 21, 2021 at 9:31pm

आ. भाई अनीस जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by Samar kabeer on July 21, 2021 at 3:16pm

जनाब अनीस अरमान जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Md. Anis arman on July 20, 2021 at 1:05pm

चेतन प्रकाश जी ग़ज़ल तक आने और पसंद करने का बहुत बहुत शुक्रिया, आपके सुझाव पर ग़ौर करूँगा 

Comment by Md. Anis arman on July 20, 2021 at 1:04pm

दीपांजलि दुबे जी ग़ज़ल तक आने और पसंद करने के लिए  बहुत बहुत शुक्रिया 

Comment by Chetan Prakash on July 19, 2021 at 8:19am

आदाब, अनीस अमान  कुल ग़ज़ल  अच्छी हुई है, सिवाय,  " वो दुश्मनों  की सबों में हैं और मुकाबिल  हैं",  देखिए  

हैं" का दोहराव  हो  रहा  है ! सादर  !

Comment by Deepanjali Dubey on July 19, 2021 at 2:11am
बेहतरीन ग़ज़ल आदरणीय खूबसूरत अशआर

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