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यही है शिकायत यही तो गिला है....ग़ज़ल ( सालिक गणवीर)

122-122-122-122

यही है शिकायत यही तो गिला है
चराग़ों तले क्यों अँधेरा हुआ है (1)

लुटाया है सब कुछ कहा जा रहा है
मैं ये सोचता हूँ मुझे क्या मिला है (2)

कभी सामने जो अकड़ता बहुत था
वही उसके क़दमों के नीचे पड़ा है (3)

न आगे कोई है न है कोई पीछे
बयाँ दे रहा बीच सबके खड़ा है (4)

बड़ी मुश्किलों से कटी ज़िंदगी ये
न जाने मुक़द्दर में क्या क्या लिखा है (5)

ख़ुशी के दो पल हाथ आते नहीं पर
ये ग़म है कि बरसों से पीछे लगा है (6)

मुझे मारने पर तुले हैं वो "सालिक"
मिरा क़त्ल तो पहले से हो चुका है (7)

* मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by मनोज अहसास on January 12, 2022 at 12:33am

आदरणीय भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन। ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है । हार्दिक बधाई। आदरणीय समर साहब की सलाह का संज्ञान लें । सादर..

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 5, 2022 at 11:12am

आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन। गजल का प्रयास अच्छा है । हार्दिक बधाई। 

आ. भाई समर जी की सलाह का संज्ञान लें । सादर..

Comment by Samar kabeer on December 30, 2021 at 3:38pm

जनाब सालिक गणवीर जी आदाब , ग़ज़ल अभी समय चाहती है , बहरहाल इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें I 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 30, 2021 at 11:26am

बढ़िया ग़ज़ल कही आदरणीय सालिक जी हार्दिक बधाई

कृपया ध्यान दे...

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