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भ्रम जाल ये कैसा फैला

खुद को खुद ही भूल चुका  

ना वाणी पर संयम किसीका  

उर में माया, द्वेष भरा |

 

कोह में अपना विनती भाव भुलाया  

जो धैर्य भी से दूर हुआ

गरल इतना उर में भरा है कि

क्षमा, प्रेम करना ही भूल गया |

 

करुणा दया भी पास नहीं अब

पशुत्व के जैसा बन चुका

भलाई का दामन ओढ़ की जाने

पीठ पीछे चुरा घोप रहा |

 

आत्महित में अनेत्री बन गए जैसे  

भयंकर बैर का कालकूट पिया

धर्म निरपेक्षता भूल चुका कैसे

खुदा ने सबको पैदा किया |

 

जाने कैसी मजबूरी और

संस्कार को अपने भूल चुका

अभी भी वक़्त है थोड़ा सुधर जा

रोएगा कहीं अकेला खड़ा |

 

“मौलिक व अप्रकाशित”

Views: 472

Comment

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Comment by PHOOL SINGH on January 21, 2020 at 12:46pm

आप सभी ने मेरी रचना के लिये समय निकाला उसके आप सबका शुक्रिया

Comment by Samar kabeer on January 19, 2020 at 8:57pm

जनाब फूल सिंह जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by vijay nikore on January 19, 2020 at 6:21am

रचना अच्छी लगी। बधाई मित्र फूल सिंह जी।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 15, 2020 at 12:50pm

आ. भाई फूलसिंह जी, अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई।

कृपया ध्यान दे...

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