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चेप्टर -1 - दोहे

चेप्टर -1 - दोहे

निंदा को आतुर रहें, करें नहीं गुणगान
मैल हिया में देख के ,रूठ गए भगवान

मालिक कैसा हो गया ,  तेरा ये इंसान
बन्दे तेरे लूटता , बन  कर वो भगवान


तेरा  अजब  संसार  है,हर  कोई  बेहाल
हर मानव को यूँ लगे, जग जैसे जंजाल


संस्कार  सब  खो गए ,  बढ़ने  लगी  दरार
जनम जनम के प्यार का, टूट गया आधार

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by narendrasinh chauhan on July 4, 2015 at 6:52pm

खूब सुन्दर दोहावाली , हार्दिक बधाई आपको इस प्रस्तुति पर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 4, 2015 at 4:16pm

बहुत सुन्दर दोहावली हुई है आदरणीय सर 

जुझावों पर अमल से दोहे और निखर जायेंगे 

हार्दिक बधाई आपको इस प्रस्तुति पर 

Comment by Sushil Sarna on July 4, 2015 at 11:43am

 आदरणीय  Pari M Shlok जी प्रस्तुति पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on July 4, 2015 at 11:43am

आदरणीय Ashok Kumar Raktale जी आपने अपना अमूल्य समय देकर जो गणना दर्शाई उसके लिए हार्दिक आभार। सर मैंने 'संस्कार ' की गणना ( सं २ +आधा स १ +का २ +र १ =6 )की थी क्या स्वरहीन व्यंजन पर अनुस्वार (.) के बाद आधे व्यंजन की मात्रा गौण हो जाती है ? अपने मार्गदर्शन से अनुग्रहित करें । हार्दिक आभार। 

Comment by Pari M Shlok on July 4, 2015 at 10:11am
सुन्दर ..दोंहें ..
Comment by Ashok Kumar Raktale on July 3, 2015 at 11:18pm

जी ! "संस्कार सब खो गए " ५-२-२-३ = १२ मात्राएँ होती हैं. सादर.

Comment by Sushil Sarna on July 3, 2015 at 10:55pm

 आदरणीय   krishna mishra 'jaan'gorakhpuri जी प्रस्तुति पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on July 3, 2015 at 10:55pm

आदरणीया  MAHIMA SHREE जी प्रस्तुति पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on July 3, 2015 at 10:53pm

आदरणीय Ashok Kumar Raktale जी दोहों पर आपकी स्नेहिल उपस्थिति का तहे दिल से शुक्रिया। तीसरे दोहे के प्रथम विषम चरण में मात्रा की चूक हो गई आपके ध्यानाकर्षण का हार्दिक आभार लेकिन चौथे दोहे में मैं आपके इशारे को समझ नहीं पाया। मुझे मात्रा सही लग रही है कृपया स्पष्ट करें ताकि वांछित सुधार किया जा सके। तीसरे दोहे के ये सुधार शायद आपको संतुष्ट कर सके। हार्दिक आभार। कृपया स्नेह बनाये रखें।

कैसा ये   संसार है ,  हर   कोई   बेहाल
हर मानव को यूँ लगे, जग जैसे जंजाल

Comment by Ashok Kumar Raktale on July 3, 2015 at 10:34pm

आदरणीय  सुशील सरना  जी सादर, दोहों  पर  अच्छा  प्रयास  हुआ  है. तीसरे  और  चौथे  दोहे  के  पहले  चरण  की  मात्राएँ  पुनः जांच  लें. सादर.

 

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