For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

सुनो ऋतुराज- 15 

सुनो ऋतुराज!!

वह एक अन्धी दौड थी 
हांफती हुई 
हदें फलांगती हुई 
परिभाषाओं के सहश्र बाड़ो को 
तोडती हुई
फिर भी वह भ्रम नही टूटा 
जिसे तोडने के लिये संकल्पित थे हम 
ऋतुओं का मौन यूँ ही बना रहा 
सावन बरस् बरस कर सूख गया 
हम अन्धड़ के वेग मे भी तने रहे 
और आसक्ति का वृक्ष सूख गया 
सुनो ऋतुराज 
लमहों का बही खाता 
जब भी खोलोगे 
दग्ध ह्रदय पर लिखा 
शुभलाभ अवश्य दिखेगा 
प्रतीक्षा के तोरणद्वार पर 
मिलन का रिक्त मंगलघट भी दिखेगा 
दिखेगी वह पगडन्डी भी 
जो बन गई थी उस 
अन्धी दौड की एक मात्र गवाह
सुनो ऋतुराज 
मिथ्या है विलय 
भ्रामक है एकात्म की अवधारणा पर 
प्रेम की गणना 
सत्य तो यह है कि 
हम भी हैं और तुम भी हो 
एक दूजे के साथ भी 
एक दूजे के बिना भी ....................................

gul sarika

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Views: 750

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Sushil.Joshi on November 9, 2013 at 12:26pm

एक बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति के लिए बधाई स्वीकारें आ0 सारिका जी....

Comment by रमेश कुमार चौहान on November 8, 2013 at 7:16pm

आदरणीया बहुत गहन कथ्य प्रस्तुत किया है आपने ५

मिथ्या है विलय 
भ्रामक है एकात्म की अवधारणा पर 
प्रेम की गणना 
सत्य तो यह है कि 
हम भी हैं और तुम भी हो 
एक दूजे के साथ भी 
एक दूजे के बिना भी .............. वाह बधाई


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 8, 2013 at 3:58pm

बहुत ही गहन अनुभूत कथ्य को बिम्बों के माध्यम से निर्बाध कहती गयी अभिव्यक्ति..

पूर्ण समर्पण भी निज अस्तित्वों का विलय कर एकत्व की अवधारणा पर मानवीय इकाइयों के प्रेम को शतप्रतिशत खरा नहीं पाता..

ये भी सच है कि खोने को कुछ नहीं होता लम्हों के बही खातों पर अनुभव का शुभलाभ तो सदा सर्वदा ही प्राप्य है

 और अंत में एक सत्य 

हम भी हैं और तुम भी हो 
एक दूजे के साथ भी 
एक दूजे के बिना भी..............बहुत सुन्दर! 

ऐसी अभिव्यक्तियाँ मन हृदय चिंतन मनन हर स्तर पर पाठक को स्पर्श करती हैं...बहुत बहुत बधाई इस प्रस्तुति पर.

सादर.

Comment by Satyanarayan Singh on November 7, 2013 at 5:31pm

आदरणीया. गुल जी
बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति हेतु बधाई.
 सुनो ऋतुराज
लमहों का बही खाता
जब भी खोलोगे
दग्ध ह्रदय पर लिखा
शुभलाभ अवश्य दिखेगा
प्रतीक्षा के तोरणद्वार पर
मिलन का रिक्त मंगलघट भी दिखेगा .....

सुनो ऋतुराज
मिथ्या है विलय
भ्रामक है एकात्म की अवधारणा पर
प्रेम की गणना
सत्य तो यह है कि
हम भी हैं और तुम भी हो
एक दूजे के साथ भी
एक दूजे के बिना भी ....................................

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 7, 2013 at 4:27pm

The poem ends well . I  appreciate   the feelings.

Comment by Sachin Dev on November 6, 2013 at 6:34pm

खूबसूरत रचना हार्दिक बधाई आपको ! 

Comment by अरुन 'अनन्त' on November 6, 2013 at 1:10pm

आदरणीया ओ बी ओ परिवार में आपका हार्दिक स्वागत है आपकी रचना प्रथम बार पढ़ रहा हूँ, बहुत ही सुन्दर भाव पिरोये हैं आपने रचना में, रचना मुझे पसंद आई बधाई स्वीकारें.

Comment by Meena Pathak on November 6, 2013 at 12:55pm

सुन्दर अभिव्यक्ति | बहुत बहुत बधाई आप को 

Comment by Gul Sarika Thakur on November 6, 2013 at 10:10am

Abhar Ram shirmomani pathak jee .. Shijju shakoor jee ... 

Comment by ram shiromani pathak on November 6, 2013 at 9:56am

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति   ,,,,,,,बहुत  बहुत बधाई  आदरणीया गुल  जी। ।सादर  

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"इश्क़ तो है मगर ये इतनी भी शा'इराना नहीं कि तुझ से कहें साफ़ गोई सुनोगे क्या तुम ये अहमकाना…"
8 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"एक सप्ताह के लिए सभी चार आयोजन के द्वार खुल गए। अच्छी बात ये है कि यह एक प्रयोग है ..... लेकिन…"
yesterday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"चौपाई छंद ++++++++   ठंड गई तो फागुन आया। जन मानस में खुशियाँ लाया॥ आम  लगे सब हैं…"
yesterday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"सच फ़साना नहीं कि तुझ से कहें ये बहाना नहीं कि तुझ से कहें दिल अभी जाना नहीं कि तुझ से कहें ग़म…"
yesterday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"सादर अभिवादन "
yesterday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"सभी की नमस्कार, यूँ तो आज आयोजन प्रारंभ ही हुए हैं और किसी प्रकार की टिप्पणी करना उचित नहीं है,…"
yesterday
Admin replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"स्वागतम"
Tuesday
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"स्वागतम"
Tuesday
Admin replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"स्वागतम"
Tuesday
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-184
"स्वागतम"
Tuesday
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"आपकी बात से सहमत हूँ। यह बात मंच के आरंभिक दौर में भी मैंने रखी थी। अससे सहजता रहती। लेकिन उसमें…"
Monday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . .विविध

दोहा सप्तक. . . . . . विविधकभी- कभी तो कीजिए, खुद से खुद की बात ।सुलझेंगे उलझे हुए,  अंतस के हालात…See More
Monday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service