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ये रंजिश का दौर नया है ,
हाँ, साज़िश का दौर नया है ।
कितने बेबस चहरे देखो ,
फिर यूरिश का दौर नया है ।
हम क्या खायें, क्या पहनें अब ,
बस, काविश का दौर नया है ।
भाई-भाई का दुश्मन है ,
ये सोज़िश का दौर नया है ।
शक हर इक पर है अब यारो ,
हाँ, पुरसिश का दौर नया है ।
धन-दौलत के दीवाने सब ,
पैमाइश का दौर नया है ।
सूखी-सूखी नदियाँ हैं सब ,
अब बारिश का दौर नया है ।
शब्दार्थ:--
यूरिश-हमला
सोज़िश-जलन
काविश-तलाश
परसिश-पूछताछ
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

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Comment

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Comment by Mohammed Arif on July 22, 2017 at 8:06am
बहुत-बहुत शुक्रिया मोहतरम तस्दीक अहमद साहब ।
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on July 21, 2017 at 10:09pm
मुहतरम जनाब आरिफ साहिब आदाब, उम्दा ग़ज़ल हुई है ,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं
Comment by Mohammed Arif on July 21, 2017 at 1:23pm
ग़ज़ल पर अपनी अमूल्य प्रतिक्रिया देकर कृतार्थ करने और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय विजय निकोर जी ।
Comment by vijay nikore on July 21, 2017 at 11:27am

//भाई-भाई का दुश्मन है ,
ये सोज़िश का दौर नया है ।
शक हर इक पर है अब यारो ,
हाँ, पुरसिश का दौर नया है ।//

बहुत ही खूबसूरत गज़ल लिखी है, खयाल बहुत अच्छे उतरे हैं। दिल से बधाई, भाई मोहम्मद आरिफ़ जी।

Comment by Mohammed Arif on July 21, 2017 at 9:53am
बहुत-बहुत आभार आदरणीय गुरप्रीत जी ।
Comment by Gurpreet Singh jammu on July 21, 2017 at 9:18am

अच्छी ग़ज़ल है आदरणीय मोहम्मद आरिफ जी,, कुछ नए शब्द भी पता चले आप की इस ग़ज़ल के माध्यम से, 

Comment by Mohammed Arif on July 20, 2017 at 11:06pm
हृदयतल से आभार आदरणीय गिरिराज भंडारी जी । लेखन सार्थक हुआ ।
Comment by Mohammed Arif on July 20, 2017 at 11:05pm
हृदयतल से आभार आदरणीय लक्ष्मण धामी जी । लेखन सार्थक हुआ ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 20, 2017 at 8:30pm

आदरणीय आरिफ भाई , खूब सूरत गज़ल के लिये बधाइयाँ स्वीकार करे ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 20, 2017 at 8:02pm
आ. भाई आरिफ जी अच्छी गजल हुई है ।हार्दिक बधाई ।

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