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तरही ग़ज़ल नंबर-3

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
(मक़्ते में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ को नज़र अंदाज़ कर दें)

रफ़्ता रफ़्ता सारी अफ़वाहें कहानी हो गईं
तल्ख़ियाँ इतनी बढ़ीं रेशा दवानी हो गईं

हिज्र की रातों में इतनी बार उनके ख़त पढ़े
याद मुझको सारी तहरीरें ज़बानी हो गईं

हाल वो देखा ग़ज़ल का आज यारो,शर्म से
'मीर'-ओ-'ग़ालिब' की भी रूहें पानी पानी हो गईं

क़ह्र को बाँधें क़हर वो और टोको तो कहें
शे'र कहने की ये तरकीबें पुरानी हो गईं

जानते हो ख़ूब यारो ओबीओ के मंच पर
जिसने सीखा उसकी ग़ज़लें जाविदानी हो गईं

ज़ह्नियत का है ये झगड़ा हिन्दी उर्दू का नहीं
छोड़िये अब ये "समर" बातें पुरानी हो गईं
________

रेशा दवानी :- फ़साद
तल्ख़ियाँ :- कड़वाहटें

--समर कबीर
मौलिक/अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 9, 2017 at 10:00pm
ज़बाँ की सारी लड़ाई ये उर्दू वो हिंदी
ये बह्स छोड़ के तुम शाइरी की बात करो

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 9, 2017 at 8:26pm
वाह जनाब एक और लाजवाब ग़ज़ल, बहुत बहुत बधाई आपको। आपने मक्ते में जो कहा है कुछ वैसा ही हमने भी कहा था। :-)
Comment by Gurpreet Singh jammu on April 9, 2017 at 11:43am
वाह वाह आदरणीय समर कबीर जी...इस ज़मीन पर तीन गजलें और तीनों की तीनों क्या खूब, दमदार


रफ़्ता रफ़्ता सारी अफ़वाहें कहानी हो गईं
तल्ख़ियाँ इतनी बढ़ीं रेशा दवानी हो गईं

हिज्र की रातों में इतनी बार उनके ख़त पढ़े
याद मुझको सारी तहरीरें ज़बानी हो गईं

क्या बात है सर जी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 9, 2017 at 11:26am

क्या बात है , आदरणीय समर भाई , एक ही ज़मीन पर आपकी ये तीसरी गज़ल .. क्या खूब कही है आपने । दिली मुबारकबाद कुबूल कीजिये ।

Comment by TEJ VEER SINGH on April 9, 2017 at 10:40am

बेहतरीन गज़ल आदरणीय समर क़बीर साहब जी, आदाब। हार्दिक बधाई।

Comment by Mohammed Arif on April 9, 2017 at 7:43am
आदरणीय समर कबीर साहब आदाब, हर बार की तरह इस बार भी ज़ोरदार,धमाकेदार, असरदार ग़ज़ल का आगाज़ । हर शे'र बेजोड़,बेमिसाल और सोचने पर मज़बूर कर देने वाला । आपको शहंशाह-ए-ग़ज़ल यूँ ही नहीं कहा जाता है । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ क़ुबूल करें ।
Comment by दिनेश कुमार on April 9, 2017 at 6:34am
बहुत ख़ूब आदरणीय समर साहब। बहुत बढ़िया अशआर हुए हैं। वाह वाह वाह।
हिज्र की रातों में इतनी बार उनके ख़त पढ़े
याद मुझको सारी तहरीरें ज़बानी हो गईं। वाह वाह । कितनी आसानी से शेर कह दिया है। वाह सर।

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