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झूलों पर भी रोक लगी -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'( गजल )

२२२२/२२२२/२२२२/२२२


सुनो सखी इस सावन में तो झूलों पर भी रोक लगी
जिससे लगता नेह भरी सब साँसों पर भी रोक लगी।१।
**
घिरघिर बदली कड़क दामिनी मन को हैं उकसाती पर
भरी  उमंगों  से  यौवन  की  पींगों  पर  भी  रोक लगी।२।
**
कितने मास  करोना  का  भय  देगा  कारावास हमें
मिलकर हम सब कैसे गायें गीतों पर भी रोक लगी।३।
**
सूखी तीज  बितायी  सब  ने  कैसी  होगी  राखी रब
कोई कहे न अब फिर आकर धागों पर भी रोक लगी।४।
**
चूड़ी बोले खनक खो गयी पायल बोले छमछम गुम
पाँवो की थिरकन के  साथी हाथों पर भी रोक लगी।५।
**
माहुर घुला सजन  के  मन  में  वेणी गजरे सूख गये
सब कहते हैं आज सुवासित गन्धों पर भी रोक लगी।६।
**
सुख दुख अपने साझा करते साँझ सवेरे बैठ जहाँ
पनघट छूटे, झील नदी  के  तीरों  पर भी रोक लगी।७।
**
प्रेमपथों पर मौन मिलन  के  होते थे अनुबंध बहुत
अब के सावन अनुबन्धों के पाँवों पर भी रोक लगी।८।
**
मौलिक-अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 4, 2020 at 5:15pm

आ. मधु महक जी, सादर अभि्आदन । गजल पर उपस्थिति और मान देने के लिए आभार ।

Comment by Madhu Passi 'महक' on August 3, 2020 at 9:48pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी नमस्कार ।वर्तमान की मुख्य समस्या करोना पर एक प्रेयसी की मनःस्थिति को दर्शाती बहुत ही सुंदर ग़ज़ल पर आपको हार्दिक बधाई।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 31, 2020 at 4:19pm

आ. भाई अमीरुद्दीन जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on July 30, 2020 at 9:09pm

जनाब लक्ष्मण धामी मुसाफिर जी आदाब, सम-सामयिक परिस्थितियों पर हिन्दी ज़बान में शानदार ग़ज़ल हुई है, भरपूर दाद के साथ बधाई स्वीकार करें। सादर। 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 30, 2020 at 4:38pm

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उत्साहवर्धक टिप्पणी के लिए आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 30, 2020 at 2:44pm

आ. डिम्पल शर्मा जी, सादर अभिवादन । आपको गजल अच्छी लगी, यह मेरे लिए हर्ष का विषय है । गजल तक आने के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by TEJ VEER SINGH on July 30, 2020 at 10:33am

हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी।बेहतरीन गज़ल।

सुख दुख अपने साझा करते साँझ सवेरे बैठ जहाँ
पनघट छूटे, झील नदी  के  तीरों  पर भी रोक लगी।७।

Comment by Dimple Sharma on July 30, 2020 at 8:34am

आदरणीय लक्ष्मण धामी'मुसाफिर'जी नमस्ते,आज के ताज़ा हालात पर लिखी आपकी यह ग़ज़ल बहुत ख़ूब हुई है, बधाई स्वीकार करें आदरणीय।

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