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भोर का सूरज उजला क्यों है -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'(गजल)

२२२२/२२२२/२२२२/२२२

ठूँठ हुआ पर छाँव में अपनी नन्हा पौधा छोड़ गया
कैसे कह दूँ पेड़  मरा  तो  मानव चिन्ता छोड़ गया।१।
**
वैसे तो  था  जेठ  हमेशा  लेकिन  जाने  क्या सूझी
अब के मौसम हिस्से में जो सावन आधा छोड़ गया।२।
**
"दिखे टूटता तो फल देगा", चाहे ये किवँदन्ती पर
आशाओं के कुछ तो बादल टूटा तारा छोड़ गया।३।
**
या रोटी की रही विवशता या सीमा की रखवाली
बूढ़ी माँ की आँखे गीली जो फिर बेटा छोड़ गया।४।
**
इन्द्र धनुष जो नभ पर  फैला उसके ऐसे रंग न थे
रंगत भायी दुनिया की तो जो था सादा छोड़ गया।५।
**
भोर का सूरज उजला क्यों है कहते कारण इसका ये
ढलते ढलते चाँद जो हिस्से अपना उजाला छोड़ गया।६।

***
मौलिक-अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

Views: 544

Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 29, 2020 at 9:15am

आ. मधु 'महक' जी, सादर अभिवादन । गजल तक आने और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by Madhu Passi 'महक' on July 28, 2020 at 9:48pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी ' मुसाफिर' जी बेहतरीन ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद कुबूल करें।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 27, 2020 at 12:55pm

आ. भाई बसंत कुमार जी, सादर अभिवादन । आपको गजल अच्छी लगी , यह मेरे लिए हर्ष का विषय है । उत्साहवर्धन व स्नेह के लिए आभार ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 27, 2020 at 12:49pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी सादर नमस्कार 

लाजबाब ग़ज़ल हुई है , बधाई आपको 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 27, 2020 at 9:53am

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार।

Comment by TEJ VEER SINGH on July 26, 2020 at 7:27pm

हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी। बेहतरीन गज़ल।

या रोटी की रही विवशता या सीमा की रखवाली
बूढ़ी माँ की आँखे गीली जो फिर बेटा छोड़ गया।४।

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