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न्याय की जब से हुई हैं कच्ची सारी डोरियाँ - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२२/२१२


भाव अब तो पाप - पुण्यों के बराबर हो गये
देवता क्योंकर जगत में आज पत्थर हो गये।१।
**
थी जहाँ पर अपनेपन की लहलहाती खेतियाँ
स्वार्थ से कोमल ह्रदय  के  खेत ऊसर हो गये।२।
**
न्याय की जब से हुई  हैं कच्ची सारी डोरियाँ
तब से जुर्मोंं के  महावत  और  ऊपर हो गये।३।
**
दूध, लस्सी, घी अनादर का बने पहचान अब
पैग व्हिस्की मय पिलाना आज आदर हो गये।४।
**
दुश्मनों ने की मुनादी कुछ पुरस्कारों की जब
प्राण हरने को यहाँ  झट  अपने तत्पर हो गए।५।
**
काम जिनका घटती दूरी की दिलाना आस था
मील के पत्थर वो पथ में  आज ठोकर हो गए।६।

मौलिक-अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 22, 2020 at 11:16pm

आ. भाई विजय शंकर जी, सादर अभिवादन ।आपको गजल अच्छी लगी यह मेरे लिए हर्ष का विषय है । उपस्थिति व स्नेह के लिए आभार ।

Comment by Dr. Vijai Shanker on July 22, 2020 at 8:50pm

न्याय की जब से हुई हैं कच्ची सारी डोरियाँ
तब से जुर्मोंं के महावत और ऊपर हो गये।३।
आदरणीय लक्ष्मण धामी मुसाफिर जी , हार्दिक बधाई , बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति हुयी। सादर।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 22, 2020 at 4:55pm

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति व सराहना के लिए आभार ।

Comment by TEJ VEER SINGH on July 22, 2020 at 9:21am

हार्दिक बधाई आदरणीय  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी। बेहतरीन गज़ल।

न्याय की जब से हुई  हैं कच्ची सारी डोरियाँ
तब से जुर्मोंं के  महावत  और  ऊपर हो गये।३।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 21, 2020 at 8:56pm

आ. भाई बसंत कुमार जी, सादर अभिवादन ।आपको गजल अच्छी लगी यह मेरे लिए हर्ष का विषय है । उपस्थिति व स्नेह के लिए आभार ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 21, 2020 at 8:37pm

आदरणीय  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी सादर नमस्कार 

बहुत सुंदर गजल के लिए मुबारकबाद आपको 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 21, 2020 at 2:05pm

आ. भाई रवि शुक्ला जी, सादर अभिवादन । लम्बे अंतराल के बाद मंच और गजल पर आपकी उपस्थिति से मन हर्षित हुआ । स्नेह व उत्साहवर्धन के लिए आभार ।

त्रुटि की ओर ध्यान दिलाने के लिए धन्यवाद।

Comment by Ravi Shukla on July 21, 2020 at 11:57am

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी  बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है आपने बधाई स्वीकार करें। दूध, लस्सी, घी अनादर का बने पहचान अब इस मिसरे में अनादर की पहचान होना चाहिये शायद । 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 21, 2020 at 4:12am

आ. भाई अमीरूद्दीन जी, सादर अभिवादन । आपको गजल अच्छी लगी यह मेरे लिए हर्ष का विषय है । उपस्थिति व स्नेह के लिए आभार ।

इंगित मिसरे में सुधार कर लिया है । देखिएगा।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on July 21, 2020 at 12:40am

जनाब लक्ष्मण धामी मुसाफिर जी आदाब, बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है आपने बधाई स्वीकार करें।

मिसरा "खून चोरी रेप दंगो के महावत और ऊपर हो गये।३।   बह्र में नहीं है देखियेगा। सादर। 

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