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'हम जातीय आधार पर विकास की योजनाएं बनाएंगे।'

'क्या अमीर -गरीब जाति के आधार पर होते हैं?' बाबा ने सवाल ठोका।

'नहीं,पर पता तो चले कि किस जाति में कितने गरीब हैं।'

'कमीने!जिससे तुमलोगों को अपनी कारस्तानी फैलाने का मौका मिले,यही न? वोटजात ससुर!भागता है कि नहीं हियां से?'गांव के बूढ़े बाबा ने विधायक प्रतिनिधि को खदेड़ा।

"मौलिक व अप्रकाशित"

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 25, 2021 at 6:10pm

एक पक्षीय कथा-सूत्र को संवादों में बाँधा जाना कई व्यतिक्रमों का जनक हो सकता है, आदरणीय मनन कुमार जी. 

ऐसी सोच के बहुतेरे जन हैं जो जातीय जनगणना की प्रासंगिकता पर तार्किक बहस कर सकते हैं. 

बाकी आपकी लघुकथा की प्रस्तुति संवादपरक होने से आवश्यक तासीर प्रभावित करती है. 

हार्दिक बधाई

Comment by Samar kabeer on July 31, 2021 at 6:32pm

जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब, अच्छी लघुकथा हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 31, 2021 at 1:00pm

आ. भाई मनन जी, सादर अभिवादन। राजनीतिक कुमंशाओं पर वार करती सुन्दर लघुकथा हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by TEJ VEER SINGH on July 29, 2021 at 11:26am

हार्दिक बधाई मनन कुमार जी। अति सुन्दर लघुकथा।

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