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सांसारिक कर्मों संग, याद रहे प्रभु नाम। 

ईश कृपा बनी रहे, बन जाएँ सब काम॥

2.

जैसा जैसा समय हो, वैसे होते काम।

चिंता काहे हम करें, मदद करें श्री राम॥ 

3.

कोमल तन कटि क्षीण सी, सुंदर मोहक रूप।

वेणी नागिन सी बनी, चंचल नयन अनूप ॥

4.

कर्म कमाई आपकी, बदले सब संस्कार।

अनुचित अर्जित संपदा, हो दुख का आधार॥ 

5.

दुर्योधन ने कब  किया, मित्रोचित व्यवहार।

दिया स्वार्थवश कर्ण को, अंग राज्य उपहार॥

6

बेटी विवाहित मत करें,प्रतिदिन सीख सलाह।

बसते घर अब उजड़ते, बढ़े कलह अरु ढाह ॥

7.

मोबाइल पर दे रही ,माँ जब सीख सलाह ।

मुश्किल घर तब बसना, कैसे हो निर्वाह ॥

स्वरचित मौलिक 

ओम प्रकाश शर्मा।  

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Comment by Chetan Prakash on September 4, 2021 at 11:59am

नमस्कार, शर्मा जी, 'सुन्दर उज्ज्वल रूप' तीसरे दोहे का सम चरण है, किन्तु मात्रा एं बारह हैं! ' बदले यहाँ संस्कार' चौथे दोहे का द्वितीय चरण, मात्राओं की संख्या तेरह है! 'मित्रोचित व्यवहार' पांचवा दोहा, द्वितीय चरण, मात्राओं की संख्या दस है! 'बेटी विवाहित मत करें' छठवें दोहे का प्रथम चरण, लेकिन चौदह मात्राएँ हैं! शर्मा जी कई स्थलों पर प्रवाह ही नहीं है! सादर 

Comment by Samar kabeer on September 3, 2021 at 12:21pm

जनाब ओमप्रकाश जी आदाब, आपके दोहे अभी बहुत समय चाहते हैं, लिखना चाहते हैं, पहले भी आपकी बताया था,अगर आप दोहे लिखना चाहते हैं तो आपको इसका विधान पढ़ना होगा ।

Comment by मनोज अहसास on September 2, 2021 at 11:55pm

आपने बहुत अच्छे दोहे लिखे आदरणीय सादर बधाई

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